संविधान से क्रांति तक:
एक पुस्तक, एक संकल्प,
"NCSC के अंबेडकर जयंती कार्यक्रम में बाबा साहब की विचारधारा को नया आयाम"
विजय कुमार | वरिष्ठ पत्रकार |
जब देश भारत रत्न डॉ. भीमराव अंबेडकर की 135वीं जयंती मना रहा था, उसी दिन राजधानी नई दिल्ली में राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (NCSC) ने एक ऐसा आयोजन किया जो केवल स्मृति नहीं, बल्कि संकल्प का कार्यक्रम था।
अंबेडकर जयंती 2026 पर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने बाबा साहब को श्रद्धांजलि दी और इस अवसर पर संबोधित करते हुए कहा कि बाबा साहब का जीवन संघर्ष, साहस और संकल्प का अद्वितीय उदाहरण है।
इसी पावन अवसर पर NCSC के कार्यक्रम में उन्होंने "From Constitutional Promise to Social Revolution" पुस्तक का विमोचन किया — और इस एक कार्य से यह संदेश दिया कि बाबा साहब का संविधान केवल कागज़ का दस्तावेज नहीं, जीवन बदलने की शक्ति है।
पुस्तक का महत्व: वादे से क्रांति तक
"From Constitutional Promise to Social Revolution" — इस शीर्षक में ही उस पीड़ा और उस उम्मीद का सार है जो भारत के दलित, वंचित और अनुसूचित समाज ने 75 वर्षों से जी है।
बाबा साहब ने संविधान में समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व का वादा किया था।
लेकिन वादे और ज़मीनी हकीकत के बीच की खाई आज भी गहरी है।
यह पुस्तक उसी खाई को पाटने का प्रयास है — यह बताने का कि संवैधानिक प्रावधानों को सामाजिक क्रांति में कैसे बदला जाए।
किशोर मकवाना जी ने स्वयं डॉ. अंबेडकर पर 9 पुस्तकें लिखी हैं (Press Information Bureau) — इसलिए उनकी उपस्थिति में इस पुस्तक का विमोचन केवल औपचारिकता नहीं, वैचारिक निरंतरता का प्रतीक है।
NCSC की भूमिका: संरक्षण से आगे, परिवर्तन की ओर
श्री किशोर मकवाना ने पदभार संभालने के बाद कहा था कि वे अनुसूचित जाति समुदाय के हितों और अधिकारों की रक्षा के लिए लगातार काम करेंगे। (Press Information Bureau) आज का यह आयोजन उसी वचन की अगली कड़ी है।
आयोग का कार्य केवल शिकायतें सुनना नहीं — बल्कि नीति निर्माण को दिशा देना है। इस पुस्तक विमोचन के माध्यम से NCSC यह संकेत दे रहा है कि वह अपनी भूमिका को सीमित प्रशासनिक दायरे से निकालकर व्यापक सामाजिक बदलाव की प्रेरणा बनाना चाहता है।
इस अवसर पर एक तथ्यात्मक स्पष्टीकरण आवश्यक है: डॉ. भीमराव अंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 को हुआ था। वर्ष 2026 में उनकी 135वीं जयंती मनाई जा रही है — 136वीं नहीं। अंबेडकर जयंती 2026, बाबा साहब की 135वीं जन्म जयंती है। सम्मान में सटीकता भी आवश्यक ।
निष्कर्ष:
किताबें बदलती हैं दुनिया,
बाबा साहब स्वयं महान पुस्तक-प्रेमी थे। उनके पास 50,000 से अधिक पुस्तकों का व्यक्तिगत संग्रह था। उन्होंने कहा था —
"शिक्षा वह शेरनी का दूध है, जो भी पीएगा वो दहाड़ेगा।"
आज जब NCSC के मंच पर "From Constitutional Promise to Social Revolution" का विमोचन हुआ — तो वह दहाड़ फिर गूँजी।
यह पुस्तक एक दस्तावेज़ नहीं, एक आंदोलन का बीज है।
बाबा साहब को उनकी 135वीं जयंती पर कोटि-कोटि नमन।
"जो इतिहास को भूलते हैं, वे इतिहास बनाने में असमर्थ रहते हैं।"
— डॉ. भीमराव अंबेडकर