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बिहार: नए 'चेहरे' का पुराना खेल या लोकतंत्र का सबसे बड़ा 'मजाक'?

बिहार की राजनीति आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहाँ सवाल नीति का नहीं, बल्कि कुर्सी के 'गणित' का है। जिस राज्य ने दुनिया को नालंदा और विक्रमशिला जैसे विश्वविद्यालय दिए, आज उसकी सत्ता की बागडोर संभालने वाले चेहरों की शैक्षणिक योग्यता और प्रशासनिक विजन पर सवाल उठना न केवल लाजमी है, बल्कि चिंताजनक भी है।

योग्यता बनाम 'जाति' का दांव
विडंबना देखिए, जो भाजपा विपक्ष के नेताओं को 'नौवीं फेल' का ताना देकर सत्ता की सीढ़ियां चढ़ी, आज उसी के पास अपने कुनबे में कोई ऐसा 'पढ़ा-लिखा' या 'विज़नरी' चेहरा नहीं मिला जिसे वह मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा सके। क्या बिहार का नेतृत्व करने के लिए सिर्फ एक खास 'जाति' का होना और 'वोट बैंक' में फिट बैठना ही एकमात्र पैमाना रह गया है? यदि इतने लंबे समय तक सत्ता के गलियारों में रहने के बाद भी पार्टी एक योग्य उम्मीदवार तैयार नहीं कर पाई, तो यह उस संगठन की विफलता है या बिहार की जनता का दुर्भाग्य?

जनता के बीच यह चर्चा आम है कि क्या यह बदलाव बिहार के विकास के लिए है या दिल्ली में बैठे 'रिंग मास्टर्स' के इशारे पर नाचने वाले एक 'आज्ञाकारी' मोहरे की तलाश थी?

डिप्टी सीएम के तौर पर जिनकी कोई खास उपलब्धि नहीं रही, उन्हें सूबे का मुखिया बनाना यह संकेत देता है कि प्राथमिकता 'विकास' नहीं, बल्कि 'नियंत्रण' है।

प्रधानमंत्री मोदी देश भर में 'महिला आरक्षण' और 'नारी शक्ति' का डंका पीटते हैं, लेकिन जब बिहार जैसे बड़े राज्य में नेतृत्व सौंपने की बात आई, तो क्या भाजपा के पास एक भी सक्षम महिला नेता नहीं थी?

नीतीश कुमार ने 'जीविका दीदी' और 'साइकिल योजना' के जरिए जो महिला वोट बैंक तैयार किया था, क्या नई सरकार उसे सहेज पाएगी या सिर्फ नारों तक सिमट कर रह जाएगी?

बिहार की जनता आज कुछ कड़वे जवाब चाहती है जैसे :

उत्तर बिहार और दक्षिण बिहार में विकाश की जो गहरी खाई है क्या वो उसको खत्म कर पाएंगे ?

उत्तर बिहार से आने वाले विजय चौधरी और विजेंद्र यादव जिनको जेडीयू कोटा से उप मुख्यमंत्री बनाया गया है , बनाए जाने के बाद हाशिए पर रखे उत्तर बिहार का काया कल्प हो पाएगा ?


क्या केंद्र और राज्य में एक ही विचारधारा की सरकार होने से बिहार के मजदूरों को दूसरे राज्यों में दर-दर भटकने से मुक्ति मिलेगी?

क्या बिहार में कोई ऐसा बड़ा प्रोजेक्ट आएगा जो यहीं रोजगार पैदा करे?

जो शराबबंदी सिर्फ कागजों पर है और जिससे राजस्व का भारी नुकसान हो रहा है, क्या नई सरकार उसमें सुधार का साहस दिखाएगी?

जेडीयू अब अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। ऐसे में क्या 'जन सुराज' जैसे नए विकल्प बिहार की जनता के लिए 'तीसरी राह' बन पाएंगे?

दुखद है कि मुखिया से लेकर मुख्यमंत्री तक के चुनाव में मुद्दा 'स्कूल-अस्पताल' नहीं बल्कि 'जाति' होती है। जब तक बिहार की जनता विकास के नाम पर वोट करना नहीं सीखेगी, तब तक राजनीति के 'मदारी' इसी तरह रंग बदलते रहेंगे और बिहार का भविष्य 'गठबंधन' की भेंट चढ़ता रहेगा।

बिहार अब सिर्फ चेहरों के बदलने से संतुष्ट होने वाला नहीं है। यदि यह 'डबल इंजन' की सरकार भी बिहार के युवाओं को पलायन और पिछड़ेपन से नहीं निकाल पाई, तो इतिहास इसे लोकतंत्र के नाम पर किया गया सबसे बड़ा 'सियासी मजाक' ही कहेगा।

"चेहरे वही, चालें वही, बस नया पैबंद लगाया है,बिहार की बदहाली पर फिर, सत्ता ने जश्न मनाया है।"

मनीष सिंह
शाहपुर पटोरी
@ManishSingh_PT

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