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*जमानत या जेल: क्या सब कुछ पैसों का खेल? बिलासपुर में रिश्वत के गंभीर आरोपों से न्याय व्यवस्था पर सवाल

बिलासपुर।
जिले में कानून व्यवस्था को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। जहां एक ओर पुलिस लगातार कार्रवाई कर अपनी छवि सुधारने का प्रयास कर रही है, वहीं दूसरी ओर न्यायिक प्रक्रिया में कथित भ्रष्टाचार की बातें सामने आ रही हैं, जो आम जनता के विश्वास को झकझोर रही हैं।
*5000 का कथित डिमांड?

सूत्रों के अनुसार, जमानत दिलाने के एवज में प्रति व्यक्ति ₹5000 की मांग की गई। कुल मिलाकर ₹40,000 की रकम दिए जाने के बाद ही जमानत प्रक्रिया आगे बढ़ने की बात कही जा रही है। इतना ही नहीं 40 देने के बाद भी आरोपियों के वारंट पर साइन हो गए थे क्योंकि इस स्टेनो मैडम ने ऊपर में पूरी जानकारी नहीं दी थी,,आरोप है कि जब तक यह रकम संबंधित कर्मियों तक नहीं पहुंची, तब तक वकील भी अपने मुवक्किलों को जमानत दिलाने में असमर्थ नजर आए। सूत्र यहां तक बताते हैं की जब ऊपर रकम पहुंची वारंट की हुई साइन पर्ची फटी और जमानत के आदेश जारी हुए

*वकीलों की मजबूरी भी आई सामने

कुछ वकीलों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि उन्हें रोज इसी व्यवस्था में काम करना पड़ता है। अगर वे विरोध करते हैं, तो उनके मुवक्किलों को जमानत मिलने में बाधा उत्पन्न होती है। एक वकील ने बताया कि पहले भी एक अधिवक्ता ने इसका विरोध किया था, जिसके बाद उसके मामलों में लगातार परेशानी आने लगी।

पहले भी लग चुके हैं आरोप

यह कोई पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी सिविल लाइन पुलिस द्वारा पकड़े गए आरोपियों के मामले में ₹5000 प्रति व्यक्ति लेने के आरोप सामने आ चुके हैं। बावजूद इसके, जिला प्रशासन की ओर से कोई ठोस कार्रवाई नहीं दिख रही है।

शिकायतों के बावजूद कार्रवाई का इंतजार।

बताया जा रहा है कि इस तरह की शिकायतें पहले भी कलेक्टर तक पहुंच चुकी हैं और कई बार मीडिया में भी प्रकाशित हो चुकी हैं। लेकिन अब तक कोई निर्णायक कदम नहीं उठाया गया है, जिससे लोगों में आक्रोश बढ़ता जा रहा है।

न्याय व्यवस्था पर उठते सवाल?

अगर कानून के रखवाले और न्याय दिलाने वाले ही पैसे के आधार पर फैसले लेने लगें, तो आम जनता न्याय की उम्मीद किससे करे? यह सवाल अब बिलासपुर के लोगों के बीच चर्चा का विषय बन चुका है।

*देखना होगा इस मामले में कलेक्टर क्या संज्ञान लेते है*

अब देखना यह होगा कि जिला प्रशासन इन गंभीर आरोपों पर क्या कार्रवाई करती है। क्या इस मामले की निष्पक्ष जांच होगी या फिर संबंधित कर्मचारियों अधिकारियों पर कार्रवाई? या यह मामला उस कहावत की तरह बनकर रह जाएगा, अंधेर नगरी चौपट राजा, टके सेर भाजी, टके सेर खाजा.।


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