नसेवा के 25 वर्ष : सिद्धांतों की कसौटी पर तपता मेरा संकल्प
डॉ. राजकुमार गौतम , वरिष्ठ समाजसेवी मैहर
वर्ष 2000 में जब मैंने मैहर की पवित्र भूमि पर जनसेवा का व्रत धारण किया था, तब से आज तक 25 वर्ष का एक युग बीत गया। यह कालखंड सत्ता के सोपान चढ़ने का नहीं, अपितु जनता जनार्दन के मौलिक अधिकारों की रक्षा हेतु किए गए अनवरत संघर्ष का साक्षी है।
राजनीति में मेरा प्रवेश घूसखोरी और भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक धर्मयुद्ध के रूप में हुआ था। वही विचार, वही व्यथा, वही उद्देश्य, वही दूरदृष्टि आज भी मेरे हृदय में अक्षुण्ण है। परंतु आज जब भ्रष्टाचार का नग्न तांडव देखता हूँ, तो अंतःकरण छलनी हो जाता है। भ्रष्टाचार को मिल रहा राजनीतिक संरक्षण, प्रशासनिक स्वेच्छाचारिता और ‘चोर-चोर मौसेरे भाई’ की कहावत को जीवन्त करता मैहर का राजनीतिक परिवेश — यह सब देखकर मन अत्यंत व्यथित है।
मैंने सचमुच तप किया है — क्षुधा सहन की, तृष्णा सही, सम्मान और अपमान दोनों का विष पिया। दिवस-रात्रि, मूसलाधार वर्षा, हाड़ कँपाती शीत और दाहक ग्रीष्म में, संसाधनविहीन अवस्था में भी मैहर की राजनीति के लिए अपने जीवन का एक-एक पल समर्पित किया। इस राजनीति की आत्मा को देखा, टटोला,जांच परखा और जिया।
पच्चीस वर्षों से अनवरत राजनीति और समाजसेवा में रत रहने के उपरांत भी मेरा निजी वैभव कितना बढ़ा, मेरी तिजोरी कितनी भरी — यह सूर्य के प्रकाश के समान स्पष्ट है। मैं जैसा कल था, वैसा ही आज हूँ। तब भी मोटरसाइकिल थी, आज भी मोटरसाइकिल ही है। कोई चतुष्चक्री वाहन नहीं, कोई विलासिता का साधन नहीं। मैं मैहर विधानसभा क्षेत्र के एक नन्हे से ग्राम का अधिवासी हूँ। मेरा वही पैतृक आवास है। इसके अतिरिक्त मैहर में मेरी न कोई अट्टालिका बनी, न कोई प्रासाद खड़ा हुआ। आज भी प्रतिदिन मैहर से गाँव और गाँव से मैहर की यात्रा करता हूँ। जैसा पहले था, वैसा आज भी हूँ।
मेरी संपदा बढ़ी नहीं, अपितु इस राजनीति और जनसेवा का पारितोषिक मुझे यह मिला कि मेरी संपत्ति पहले से आज की स्थिति में क्षीण ही हुई है, उसमे वृद्धि नहीं हुई। मैं जहाँ था वहाँ से भी नीचे आ गया, किंतु आत्मसम्मान और सिद्धांतों का विक्रय नहीं किया।
जनता का स्वत्व हरना, अधिकार अपहरण करना, छल-प्रपंच, कपट, कुटिलता और जालसाजी के सहारे आगे बढ़ना, धन-संग्रह की विकृत लालसा — इन दुर्गुणों से तो कोई भी अपने उत्कर्ष का ढेर लगा सकता है। परंतु ऐसे उत्कर्ष को धिक्कार है, थू है उस समृद्धि पर जो दीन-दुखियों का अधिकार छीनकर अपनी संपदा में जोड़ती है और उससे ऐश्वर्य का जीवन जीती है। कब तक यह चलेगा? एक दिन इसका अवसान अवश्यंभावी है। किंतु संघर्ष का अवसान कभी नहीं होगा, विचारों का अवसान कभी नहीं होगा, दया-करुणा-ममता का अवसान कभी नहीं होगा। परंतु अन्याय-अत्याचार करके, जनता को दिग्भ्रमित करके, लोगों की आंखों में धूल झोंककर उनका अधिकार छीनकर संपदा संचय करने वाले, नेतागिरी के इस व्यामोह में लिप्त व्यक्तियों को एक दिन निश्चित रूप से जनशक्ति के सम्मुख नतमस्तक होना पड़ेगा।
सर्वज्ञात है मेरा अतीत का संघर्ष — जिसमें निजी स्वार्थ का लेशमात्र भी स्थान नहीं था। एकमात्र लक्ष्य था: मैहर की राजनीति में आमूल-चूल क्रांति लाना, युवा-शक्ति को जागृत करना और प्रत्येक दलित, शोषित, कृषक, श्रमिक के हितार्थ, अन्याय-अत्याचार और शोषण के विरुद्ध सतत शंखनाद करना। संघर्ष के अग्रिम मोर्चे पर डटे रहना ही मेरी राजनीति का मूलमंत्र रहा है।
चरण-वंदना और चाटुकारिता मेरे जीवन-चरित्र से योजन दूर रही। मैंने यथार्थ की धरा पर संघर्ष किया, त्याग किया और अपना प्रबुद्ध जीवन समाज के चरणों में समर्पित किया। मैहर विधानसभा क्षेत्र के प्रत्येक ग्राम में जाकर मैंने संगठन निर्माण किया, युवाओं को संघर्ष के लिए उद्बुद्ध किया। मैहर की राजनीति में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने हेतु ग्राम-ग्राम में प्रवास कर कठोर साधना की।
मैहर में जब-जब भी जन-जागरण का अभियान चला, कृषक-श्रमिक के हितों का प्रश्न उठा, तब-तब मैंने राजनीतिक संबल के साथ अग्रणी भूमिका का निर्वहन किया। इन ढाई दशकों में मेरा एकमात्र ध्येय रहा — श्रमिकों और कृषकों के शोषण के विरुद्ध प्रखर स्वर बुलंद करना। पाषाण उद्योग, खदानों और कृषि-क्षेत्र में कार्यरत हमारे बंधु-भगिनियों पर जब-जब अन्याय हुआ, मैंने जन-आंदोलन की आधारशिला रखकर उसे धरातल पर साकार करने का दायित्व निभाया।
मैहर की राजनीति के लिए मैं एक वरिष्ठ जनसेवक हूँ और इस नाते आज मुझे वर्तमान राजनीति और राजनीतिकर्मियों की संकीर्ण मानसिकता पर गहन खेद है। आज की राजनीति मेरे पूर्व संघर्षों और उद्देश्यों का उपहास कर रही है। वर्तमान की राजनीतिक चकाचौंध और वैभव का प्रदर्शन मेरे त्याग-तपस्या का मुँह चिढ़ा रहा है। किंतु मैं भयाक्रांत नहीं, केवल विस्मय-विमुग्ध अवश्य हूँ कि क्या राजनीति का यही स्वरूप है जैसा आज दृष्टिगोचर हो रहा है?
सुस्पष्ट है कि विगत 25 वर्षों की राजनीति और वर्तमान की राजनीति में मैहर के भीतर धरा-आकाश का अंतर आ चुका है।
आज की राजनीति केवल कुर्ता-पायजामे की वेशभूषा और निजी व्यापार तक संकुचित हो गई है। जिनके कोष धन से परिपूर्ण हैं, राजनीति में उन्हीं का वर्चस्व है। सिद्धांत-विहीन व्यक्ति भी मुझे उपदेश दे रहे हैं — मुझे बड़ा कौतुक होता है। जिन्होंने अपने जीवन का एकमात्र प्रयोजन धन-संचय, निर्धनों के नेत्रों में धूल झोंककर उनकी संपत्ति का अपहरण, आडंबर और प्रदर्शन से अपनी आय में वृद्धि करना बना लिया है। जिनकी अहर्निश चिंता आपराधिक कृत्यों को अंजाम देकर राजनीतिक छत्रछाया में सुरक्षित रहने की है, ऐसे व्यक्ति भी अपने आप को जननेता समझ रहे हैं। ऐसे व्यक्ति भी अपने आप को जनता जनार्दन का हितचिंतक मान रहे हैं — यह देखकर हँसी आती है।
और ये स्वार्थी, नवदीक्षित पलक झपकते ही कुबेरपति बन गए, अपने आप को महानायक समझ बैठे। परंतु समय की कसौटी पर, नियति के न्यायालय में ये निर्वस्त्र हो जाएँगे। इनकी राजनीति की नींव हिल जाएगी। ये अधोमुखी होकर गिरेंगे। चार दिवस की चाँदनी है — लोग जगमगाते देखे गए हैं। किंतु जब काल की परीक्षा होती है, तब ये चित्त होकर धराशायी दिखाई देंगे।
ऐसे व्यक्ति भी अपने आप को राजनीतिज्ञ समझ रहे हैं, जबकि इन्हें देखकर मुझे हँसी आती है। क्या मैहर की राजनीति यही है? क्या राजनीति का मूल उद्देश्य कुर्ता-पायजामे की आभा और निजी व्यवसाय हेतु नेताओं की पद-वंदना करना ही शेष रह गया है? वेदना होती है कि लोग राजनीतिक आदर्शों को विस्मृत कर निजी स्वार्थ में निमग्न हो गए हैं।
मैं यहाँ किसी भी व्यक्ति की निंदा के उद्देश्य से नहीं, अपितु विनम्र निवेदन करने हेतु उपस्थित हूँ कि मैहर को स्वच्छ, पारदर्शी और आदर्श राजनीति प्रदान करने हेतु अपना योगदान दें। दुराचारी, उठाईगीर और सिद्धांत-विहीन व्यक्तियों की चरण-सेवा और चाटुकारिता में अपना अमूल्य समय व्यर्थ न करें। जनसेवा ही जनार्दन की सेवा है। अतः स्वच्छ कार्य करें, सन्मार्ग का अनुसरण करें। असत्य, छल, कपट, प्रपंच करने वालों से योजन दूर रहें। यही एक चिरस्थायी प्रयास होगा और आपकी दूरदर्शिता का प्रमाण होगा। मुझे यह कहने में लेशमात्र संकोच नहीं कि मैहर की राजनीति दिशाहीन हो चुकी है, पथभ्रष्ट हो गई है।
मेरे लिए राजनीति का अर्थ केवल राजसत्ता नहीं, अपितु पंक्ति के अंतिम व्यक्ति तक न्याय की पहुँच सुनिश्चित करना है। मैंने सदैव माना है कि जनता जनार्दन ही सर्वोच्च है। श्रमिक को उसके श्रम का पूर्ण मूल्य मिले, कृषक को उसकी उपज का उचित मूल्य मिले और प्रत्येक नागरिक को संविधान-प्रदत्त अधिकार अक्षुण्ण रहें ।
इस 25 वर्षीय यात्रा में अनेक बाधाएँ आईं, विरोध हुए, किंतु आपका विश्वास ही मेरी ऊर्जा बना। मैहर ने मुझे आत्मसात किया और मैंने मैहर के संघर्ष को अपनी अस्मिता बनाया।
आज जब मैहर नवसृजित जिला बनकर विकास-पथ पर अग्रसर है, मैं यह प्रण लेता हूँ कि जनता के अधिकार की यह लड़ाई अविराम जारी रहेगी
*आपका विनीत सेवक*
*डॉ. राजकुमार गौतम,वरिष्ठ समाजसेवी*
*मैहर*