पुरुष, महापुरुष कैसे?
जानिए इस सच को,जो आपके संवेदना के जड़ों को हिला देगा।
यह प्रथा, सृष्टि के उदगम काल से ही चला आ रहा है कि जीवो में, जो नर और मादा होते हैं उसमें से श्रेष्ठ कौन है। जबकि एक दूसरे के परस्पर सम्बन्ध से ही संतान की उत्पति होती है। लेकिन देखा जाय तो धरती पर पैदा होने पर असली फर्क होता तो है और वह फर्क है नर या मादा होने पर, यानि पुरुष या महिला होने पर, लेकिन सहयोग की बात करे तो ये दोनों आपस में एक दूसरे की सहयोगी भी बहुत होते हैं और कर्म क्षेत्र की बात करे तो, पुरुष का सारा काम महिला कर लेती है और महिला का सारा काम पुरुष कर लेते हैं। लेकिन फिर भी वो कौन सा गुण पुरुष में होता है जो पुरुष को महापुरुष बनाता है और महिलाएं इसे स्वीकार भी करती है, वह होता है, टूट कर बिखरना नहीं, अंतिम सांस तक भरोसे को बनाये रखना, और एक अपार संघर्ष करने की क्षमता जिसमें बुरे से बुरे परिस्थितियों में भी हार नहीं मानना आदि शामिल हैं।, क्योंकि पुरुषों के पास होता फौलादी हौसला और फौलादी जिगरा जो भगवान ने उपहार स्वरूप सिर्फ पुरुषों में ही दिया है। इसलिए एक बाप अपने परिवार के साथ गर घूमने जाता है और कोई तूफान आता है तो अपने बीबी बच्चों को कहता है कि मेरे पीछे छिप जाओ पहले तूफान मुझसे टकराएगा, जबकि ये जानते हुए कि तूफान बड़े बड़े पेड़ को उखाड़ दे रहा है लेकिन वह अपने बाल बच्चों को बचाने के लिए स्वयं को तूफान के आगे कर देता है इसलिए उस समय उसकी ताकत वास्तविक तूफान के ताकत से कई गुना ज्यादा होती है। वहीं पर एक महिला कहती है कि चलो वहां एक घर दिखाई दे रहा है वहां छिप जाते हैं। यानि पुरुष मौके वारदात पर अंजाम से निडर होकर मुकाबला करते हैं और बाजी को अपने पक्ष में करने के लिए संघर्षशील और कोशिश करते हैं। वहीं पर इस तरह का गुण बहुत कम महिलाओं में देखने और सुनने को मिलता है। इसलिए यही आदत एक पुरुष को महापुरुष बनाता है। जबकि पुरुषार्थ का गुण पाने वाली महिला हमेशा इतिहास रचती है। इसलिए मां और बहनों के बारे में मैं अपने फेसबुक पेज पर तो बहुत कुछ लिख रखे हैं लेकिन पुरुष के बारे में एक भी लेख और कविता नहीं लिख पायें है क्योंकि इसकी जरूरत महसूस नहीं होती, पुरुष नाम ही काफी है ये बताने के लिए।
"इसलिए बाप वो सूर्य का किरण है जिसका कोई अंत नहीं है, जो अनंत है, उसे बाप कहते हैं।"
" इसलिए एक बाप को, रिश्तों को बांधे रखने की चाहत और सबके साथ संबंध रखने का जुनून तथा मुश्किलों में अपनो का हाथ पकड़े रहने का अंत तक का जज्बा, बाप को सृष्टि का सबसे श्रेष्ठ महानायक बनाता है।"
इसका मतलब ये नहीं कि मां कुछ भी नहीं है, मां, मां है लेकिन वह बाप नहीं है ना हो सकती है। क्यों?
इसको जानने के लिए एक दो उदाहरण देते हैं।
मै भी एक संस्था में काम करता था, मेरे साथ फील्ड में एक सजन व्यक्ति काम करते थे मुझे अक्सर रात को 8 बजे के बाद ही जाना होता था। लेकिन साथ में वह भी ऑफिस में बैठे रहते थे। कभी कभी मैं उनसे कहता कि जाओ आप, आप क्यों बैठो हो, लेकिन यह कैह कर के कि आप भी तो बैठे हो, मै जाऊंगा तो, मुझे बना बनाया खाना मिल जाएगा और आप जाओगे तो बनाओगे तो खाओगे । इसी बीच दो तीन साल के बाद उनके पिता जी देहांत हो गया। फिर अपने डिपार्टमेंट में मैं अकेले ही बैठ कर काम पूरा करके जाने लगा, एक दिन वे संयोग से रुक गये, और जब हम लोग साथ में नीचे उतरने लगे तो मैं कहा, आजकल आप जल्दी निकल जाते हो, तब उन्होंने कहा कि हा, मृत्युंजय जी, पता नहीं सबसे पापा का देहांत हुआ है शाम होते ही ऐसा लगता है की घर समय से पहुंचना चाहिए, जबकि वो सिर्फ बैठे रहते थे। दूसरा उदाहरण मुझे देना नहीं चाहिए लेकिन दे दे रहूं ताकि पता चले क्यों बाप बाप होता है, मेरे जिंदगी में बहुत बार ऐसी घटना हुआ है जब मैं कोई समान खरीदने जा रहे हो और मेरे बच्चे पैसे माग दिये हो और पैसे लिमिट होने के नाते उन्हें भेजकर और समान बिना खरीदे वापस आ गये हो।
इसलिए माता पिता में तुलना श्रेष्ठता को लेकर नहीं होना चाहिए लेकिन दायित्व निर्वाह करने में अपने अपने स्तर से बच्चों के उज्वल भविष्य बनाने का प्रयास करना चाहिए जिससे अच्छे संस्कार के साथ कर्मठ और योग्य पुरुष या महिला हम आप समाज को दे सके।
सप्रेम धन्यवाद
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