logo
Select Language
Hindi
Bengali
Tamil
Telugu
Marathi
Gujarati
Kannada
Malayalam
Punjabi
Urdu
Oriya

"180 रूपये की जमीन, 47 साल का इंतजार और 16 लाख का बोझ " क्या यही है भारत का न्याय?



विजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार

लखनऊ(यूपी )के गोसाईंगंज का एक किसान परिवार। 1965 में पड़ोसी के साथ साझेदारी में तीन बिस्वा जमीन खरीदी — कीमत थी मात्र 180 रुपए।
यह एक साधारण किसान के जीवन भर की पूंजी और सपनों का टुकड़ा था।
फिर 1973 में हुआ वह काला खेल — शिवरानी ने धोखाधड़ी कर रामसागर की जगह किसी दूसरे को खड़ा करके उनकी पौने दो बिस्वा जमीन अपने नाम रजिस्ट्री करा ली।
जब 1977 में एक गवाह ने सच्चाई बताई,
तब रामसागर को पता चला कि उनकी जमीन किस तरह लूटी गई।
1978 में थाने में रिपोर्ट दर्ज हुई और शुरू हुई एक ऐसी लड़ाई जो 47 साल तक खिंचती रही।

वादी मरे, प्रतिवादी मरे — मुकदमा जिंदा रहा,
रामसागर 2003 में दम तोड़ गए।
वह न्याय देखने के लिए जी नहीं सके।

उनके बेटे ब्रजेश वर्मा ने बाप की अधूरी लड़ाई आगे बढ़ाई।
दूसरी तरफ शिवरानी भी 2013 में मर गईं — लेकिन उनके वारिसों ने झूठ की विरासत थामे रखी।
दोनों मुख्य पक्षकार दुनिया छोड़ गए, पर कोर्ट की फाइलें घूमती रहीं।

यह सिस्टम की सबसे बड़ी विडंबना है। जिनके लिए न्याय था, वे न्याय मिलने से पहले ही चले गए।

180 रूपये की जमीन पर 16 लाख रूपए खर्च — न्याय या सजा?

ब्रजेश वर्मा ने 16 लाख रुपये वकीलों, तारीखों और कागजी कार्रवाइयों में झोंक दिए।
सोचिए — जिस जमीन की कीमत 1965 में 180 रुपए थी, उसे पाने की कानूनी लड़ाई में उससे नौ हजार गुना ज्यादा खर्च हुआ।

क्या यही न्याय की कीमत है इस देश में?

यह एक परिवार की कहानी नहीं है — यह उन करोड़ों भूमि विवादों की दास्तान है जो भारत की अदालतों में दशकों से लटकी हैं।
राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड के अनुसार देश में चार करोड़ से अधिक मुकदमे लंबित हैं — और इनमें भूमि विवाद सबसे बड़ी संख्या में हैं।

फैसला आया, तो भी 3 माह तक कब्जा नहीं,

दिसंबर 2025 में अपर जिला जज सत्येंद्र सिंह ने फर्जी रजिस्ट्री रद्द कर ब्रजेश के पक्ष में फैसला सुनाया।
लेकिन फैसले के बाद भी तीन माह तक "कागजी कार्रवाई" के नाम पर ब्रजेश को अपनी ही जमीन से बाहर रखा गया।

47 साल लड़े। जीते। फिर भी 3 माह और इंतजार।
यह प्रशासनिक निष्क्रियता नहीं, बल्कि व्यवस्था की संवेदनहीनता है।
जब न्यायालय का आदेश हो, तो राजस्व विभाग और जिला प्रशासन की जिम्मेदारी है कि तत्काल कब्जा दिलाया जाए — न कि पीड़ित को महीनों दफ्तरों के चक्कर लगवाए जाएं।

सवाल जो सिस्टम से पूछने होंगे
1973 में हुई फर्जी रजिस्ट्री रजिस्ट्रार के दफ्तर में कैसे हो गई?
उस समय के जिम्मेदार अधिकारियों पर क्या कार्रवाई हुई?
47 साल तक मुकदमा क्यों खिंचा?
फास्ट ट्रैक कोर्ट व्यवस्था किस काम की है?
फैसले के बाद 3 माह की देरी के लिए कौन जिम्मेदार है?
संबंधित राजस्व अधिकारियों पर जवाबदेही क्यों नहीं?
16 लाख रुपए खर्च करने वाले किसान को क्या मुआवजा मिला?
धोखाधड़ी करने वाले पक्ष की संपत्ति से वसूली क्यों नहीं?

माँग और निष्कर्ष
ब्रजेश वर्मा की जीत एक व्यक्तिगत विजय है — लेकिन यह व्यवस्था की हार भी है। उनके पिता रामसागर न्याय देखे बिना मर गए। यह देश के हर उस किसान की कहानी है जिसकी जमीन धोखे से छीनी गई और जो दशकों तक कोर्ट के चक्कर काटता रहा।

हम माँग करते हैं:
भूमि विवादों के लिए 6 माह में निर्णय की बाध्यता वाले विशेष न्यायालय हर जिले में स्थापित हों,
फर्जी रजिस्ट्री पर रजिस्ट्रार की जवाबदेही सुनिश्चित हो,
न्यायालय के आदेश के 15 दिन के भीतर भूमि कब्जा दिलाने की प्रशासनिक अनिवार्यता बने,
पीड़ित पक्ष को कानूनी खर्च की प्रतिपूर्ति दोषी पक्ष से दिलाई जाए,
180 रुपया की जमीन के लिए 16 लाख रूपए और 47 साल — यह न्याय नहीं, न्याय का मजाक है।

0
24 views

Comment