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"दरवारी कवि" बनाम "पत्रकारिता": क्या लोकतंत्र का चौथा स्तंभ अपना वजूद खो रहा है ?

"जिस देश का मीडिया शोर मचाता है पर सवाल नहीं पूछता, वहां का लोकतंत्र बहरा होने लगता है।"

"वो मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता,मैं बेकरार हूँ आवाज़ में असर के लिए।"
-दुष्यन्त कुमार

आज के दौर में जब हम आधुनिकता की चरम सीमा पर हैं, हमारे समाज का सबसे महत्वपूर्ण अंग यानी 'मीडिया' एक गहरे संकट से गुजर रहा है। मीडिया, जिसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है, उसकी नींव आज विश्वास के बजाय 'टीआरपी' (TRP) और 'सनसनी' पर टिकी नजर आती है। लगता है आज वो मात्र "दरवारी कवि" बन के रह गया है ।

दुनियां में कहीं भी युद्ध हो, न्यूज़ चैनलों के स्टूडियो किसी 'वॉर ज़ोन' (War Zone) की तरह सजे नजर आते हैं। ग्राफ़िक्स के जरिए बम गिरते हुए दिखाना और न्यूज़ एंकर्स का चिल्ला कर डरावनी आवाजों में बात करना, पत्रकारिता नहीं बल्कि मनोरंजन है। जहाँ युद्ध की विभीषिका से मानवता कराह रही होती है, वहाँ हमारे न्यूज़ चैनल उसे एक 'थ्रिलर फिल्म' की तरह पेश करते हैं। उद्देश्य स्पष्ट है—सस्ती लोकप्रियता और विज्ञापनों का फायदा।

आज न्यूज़ चैनलों की बहसें किसी 'सभ्य चर्चा' जैसी नहीं, बल्कि सड़क किनारे होने वाली बेमतलब की लड़ाई जैसी लगती हैं। टीवी पर बैठे समाचार वाचक अक्सर किसी निष्पक्ष पत्रकार की तरह नहीं, बल्कि किसी राजनीतिक दल के प्रवक्ता की तरह व्यवहार करते हैं।

वह दूरदर्शन का दौर था जब समाचार का अर्थ केवल 'जानकारी' होता था। शांत आवाज, तथ्यों की शुद्धता और पूरे परिवार के साथ बैठकर खबरें देखने का संस्कार। और बच्चों को करेंट अफेयर्स , समसामयिक मुद्दों पर बात होती थी जिससे बच्चों की बौद्धिक क्षमता बढ़ती थी ।
जबकि आज समाचारों को 'प्रायोजित' (Sponsored) किया जाता है। जनता के असल मुद्दे—शिक्षा, स्वास्थ्य और बेरोजगारी—गायब हैं, और उनकी जगह गैर-जरूरी विवादों ने ले ली है।

आपको याद होगा अमरीकी पत्रकार मैरी ब्रूस ने जिन्होंने तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति से तीखे सवाल किए थे जिसके बाद उन्होंने रिपोर्टर को "खराब रिपोर्टर" कहा , लेकिन पत्रकार अपने सवाल पर टिकी रही । वह 'पत्रकारिता के साहस' का प्रतीक है। किसी भी लोकतांत्रिक देश में पत्रकार का काम सत्ता के सुर में सुर मिलाना नहीं, बल्कि सत्ता की आँखों में आँखें डालकर सवाल पूछना है। भारत जैसे विशाल देश में आज पत्रकारों के बीच दो स्पष्ट गुट दिखते हैं—एक जो डर में जी रहे हैं और दूसरे जो लाभ के लोभ में हैं। बेबाकी और निष्पक्षता जैसे शब्द आज न्यूज़ रूम्स से बाहर हो चुके हैं।

सोशल मीडिया और यूट्यूबर्स की दोहरी तलवार जब मुख्यधारा का मीडिया (Mainstream Media) जनता का भरोसा खोने लगा, तो छोटे-छोटे 'यूट्यूबर्स' ने जगह ली। यह सुखद है कि कई लोग जमीनी हकीकत दिखा रहे हैं, लेकिन इसका एक स्याह पहलू भी है। 'फॉलोअर्स' बढ़ाने की होड़ में कई बार ये लोग भी ब्लैकमेलिंग या गलत जानकारी फैलाने का जरिया बन जाते हैं। यह इस स्तंभ के बिखरने का एक और संकेत है।

आत्ममंथन और जिम्मेदारी :
यदि भारत को एक "विकसित राष्ट्र" बनना है, तो मीडिया को अपनी भूमिका समझनी ही होगी।

मीडिया को सत्ता के हवा के साथ बहने के बजाय, सरकार को सचेत करने वाला आईना बनना होगा।

सनसनी फैलाने के बजाय सच्चाई को प्राथमिकता देनी होगी।

पत्रकारिता को व्यापार से ऊपर उठकर राष्ट्र सेवा के रूप में देखना होगा।

मीडिया केवल खबरें देने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह एक अरब से ज्यादा आबादी की सोच निर्धारित करता है। यदि यह स्तंभ कमजोर हुआ, तो पूरा लोकतंत्र चरमरा जाएगा। समय आ गया है कि मीडिया अपने 'ग्लैमर' के चश्मे को उतारकर 'हकीकत' की धूल भरी सड़कों पर उतरे और आम आदमी की आवाज बने।

"साम्राज्य तब तक सुरक्षित नहीं होता जब तक उसका प्रहरी (मीडिया) जागता न हो और निडर न हो।"

मनीष सिंह
शाहपुर पटोरी
@ManishSingh_PT

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