कविता: “मज़दूर को इस जग से”
✊मज़दूर को इस जग से,
मिटा ना पाएगा कलमवाले,
जिसके दम पर चलता जग,
उसे कैसे भूलेंगे ये मतवाले।✊
✊ईंटों में उसकी मेहनत है,
मिट्टी में उसका पसीना,
उसके बिना अधूरी हर इमारत,
उसके बिना सूना हर नगीना।✊
✊धूप में जलता, बारिश में भीगता,
फिर भी न रुकता उसका काम,
अपने ख्वाबों को गिरवी रखकर,
सजाता है वो हर शाम।✊
✊रोटी के लिए जो लड़ता है,
वही असली वीर कहलाता है,
नहीं ताज, नहीं कोई सिंहासन,
फिर भी दुनिया को चलाता है।✊
✊कलम लिखे या कोई इतिहास,
उसका नाम भले छूट जाए,
पर हर पत्थर, हर दीवार,
उसकी कहानी खुद गुनगुनाए।✊
✊मज़दूर है तो दुनिया है,
उससे ही हर रंग निराला,
मिटा सके जो उसे जहाँ से,
नहीं बना ऐसा कोई हवाला।✊
✊मज़दूर को इस जग से,
मिटा ना पाएगा कलमवाले,
जब तक साँसें इस धरती पर,
जीते रहेंगे ये मेहनतवाले।✊