क्या बिहार अपनी संकीर्णता से बाहर आ पाएगा ?
"जाति-जाति का शोर मचाते,केवल कायर क्रूर, शक्तिहीन निष्ठा का संबल , मिथ्या गर्व का क्रूर" ।
- रामधारी सिंह दिनकर
आज का युग विज्ञान और तकनीक का स्वर्ण युग है। हम चंद्रमा पर जीवन की संभावनाएँ तलाश रहे हैं और 'आदित्य-L1' जैसे मिशनों के जरिए सूर्य के रहस्यों को सुलझा रहे हैं। लेकिन विडंबना देखिए, जिस समाज ने अंतरिक्ष तक अपनी पहुँच बनाई, वही समाज आज भी रंग, रूप, धर्म और सबसे घातक—जाति के भंवर में फंसा हुआ है। विशेषकर बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में, जहाँ प्रतिभा की कमी नहीं है, वहां 'जातिवाद' की यह दीमक विकास की जड़ों को खोखला कर रही है।
बिहार जो कभी ज्ञान की केंद्र बिंदु रही है उसके सामाजिक ढांचे में 'अगड़ा बनाम पिछड़ा' की लड़ाई दशकों पुरानी है। यह केवल सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि मानसिक श्रेष्ठता और हीन भावना का एक जटिल जाल है।
मेरा मानना है :
"जाती न पूछो साधु की ,पूछ लीजिए ज्ञान,
मोल करो तलवार का पड़ा रहन दो म्यान" ।
एक बड़ा वर्ग आज भी अपनी पुरानी विरासत और 'जमींदारी' के अहंकार को छोड़ नहीं पाया है। अपनी अकर्मण्यता और बदलती अर्थव्यवस्था के कारण जिनकी जमीनें बिक गईं, वे आज भी अपनी विफलता का दोष व्यवस्था और पिछड़े वर्ग की बढ़ती संपन्नता को देते हैं।
दूसरी ओर, पिछड़े वर्ग का एक बड़ा हिस्सा सदियों के शोषण की टीस को आज भी सीने में दबाए बैठा है। उनके लिए आज भी "अगड़ा" होने का मतलब "शोषक" होना है, चाहे वर्तमान परिस्थितियां बदल चुकी हों।
आजादी के बाद, संविधान ने पिछड़े वर्गों को मुख्यधारा में लाने के लिए आरक्षण और विशेष रियायतों का प्रावधान किया। निस्संदेह, इससे लाखों परिवारों के जीवन में क्रांतिकारी बदलाव आया। लेकिन यहाँ एक "पैराडॉक्स' (Paradox)" जन्म लेता है:
आज समाज में ऐसी स्थिति है जहाँ पिछड़ी जाति के कई लोग आर्थिक और सामाजिक रूप से अत्यंत सुदृढ़ हो चुके हैं, वे जमीनें खरीद रहे हैं और सत्ता में हैं, फिर भी कागजों पर वे 'पिछड़े' हैं।
जैसा मुझे लगता है व्यवस्था का लाभ लेकर कई लोग आगे बढ़े, लेकिन एक तबका ऐसा भी है जो केवल 'विक्टिम कार्ड' (पीड़ित होने का बहाना) खेलकर अपनी अकर्मण्यता को छिपाता है और मेहनत करने के बजाय दूसरों की निंदा में समय गंवाता है।
"जाति वह है जो कभी नहीं जाती, लेकिन कड़वा सच यह है कि यदि मानसिकता नहीं बदली, तो विकास की हर सीढ़ी हमें वापस पाताल की ओर ही ले जाएगी।"
विरासत में मिली कड़वाहट:
सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि हम अपनी आने वाली पीढ़ी को 'ज्ञान' से ज्यादा 'घृणा' विरासत में दे रहे हैं। अगड़ी जाति के घरों में पिछड़ों के प्रति 'खीझ' और पिछड़ी जाति के घरों में अगड़ों के प्रति 'अविश्वास' सिखाया जा रहा है। जब तक बच्चों के दिमाग में यह जहर घोला जाएगा, तब तक 'समरस समाज' की कल्पना बेमानी है।
मेरा मानना है कर्म की प्रधानता (The Power of Action)
समाज की इन उलझनों का एकमात्र समाधान "कर्म" में निहित है। समय किसी की जाति देखकर नहीं बदलता, वह केवल मेहनत और पुरुषार्थ को पहचानता है।
हमें एक ऐसा समाज बनाना होगा जहाँ सम्मान का आधार 'जन्म' नहीं बल्कि 'गुण' और 'चरित्र' हो।
अगड़ी जातियों को अपनी पुरानी झूठी शान छोड़कर मेहनत को अपनाना होगा, और पिछड़ी जातियों को अतीत के बंधनों से मुक्त होकर भविष्य के अवसरों पर ध्यान केंद्रित करना होगा।
जातिवाद का यह खेल न केवल हमारी खुशियाँ छीन रहा है, बल्कि हमारी आने वाली नस्लों को मानसिक रूप से पंगु बना रहा है। यदि हम चाहते हैं कि भारत वास्तव में विश्वगुरु बने, तो हमें "जाति" के तंग कमरों से निकलकर "राष्ट्र" के खुले आसमान में आना होगा।
अंततः श्रेष्ठ वही है जिसका आचरण श्रेष्ठ है। क्योंकि इतिहास गवाह है कि साम्राज्य जमीनों से नहीं, बल्कि जज्बों और मेहनत से बनते और बचते हैं।
(निजी राय)
मनीष सिंह
शाहपुर पटोरी
@ManishSingh_PT