" न्याय के मंदिर में 'कैश' का काला धुआं:
" इस्तीफे से सवाल खत्म नहीं होते!"
विजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार
जब न्याय की तराजू संभालने वाले हाथों पर ही सवाल उठने लगें, तो लोकतंत्र की नींव डगमगाने लगती है। जस्टिस यशवंत वर्मा का इस्तीफा महज एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि भारतीय न्यायपालिका के इतिहास का वह काला अध्याय है, जिसने 'जवाबदेही' की बहस को फिर से जिंदा कर दिया है।
पिछले साल दिल्ली के तुगलक क्रीसेंट स्थित उनके बंगले में लगी आग ने न केवल फाइलों को जलाया, बल्कि उस नकदी के अंबार को भी दुनिया के सामने ला दिया, जिसका हिसाब देना शायद नामुमकिन था। 1.5 फीट ऊंचे अधजले नोटों के ढेर ने उस गरिमा को भी स्वाहा कर दिया, जो एक जज के साथ जुड़ी होती है।
जस्टिस वर्मा का यह कहना कि जांच 'अनुचित' थी, उनके बचाव का एक हिस्सा हो सकता है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि महाभियोग की कार्यवाही पूरी होने से ठीक पहले इस्तीफा क्यों?
क्या यह सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाली सुविधाओं (पेंशन आदि) को सुरक्षित रखने की एक सोची-समझी रणनीति है?
इस्तीफा देना महाभियोग से बचने का 'सुरक्षित रास्ता' तो हो सकता है, लेकिन यह 'न्याय' नहीं है। जनता यह जानने का हक रखती है कि एक लोक सेवक के पास इतनी बड़ी मात्रा में नकदी कहां से आई। यदि जांच एजेंसियां अब इस मामले को ठंडे बस्ते में डाल देती हैं, तो यह संदेश जाएगा कि 'कानून' केवल आम आदमी के लिए है, खास के लिए नहीं।
अब गेंद सरकार और पुलिस के पाले में है। जस्टिस वर्मा अब 'जज' नहीं रहे, एक आम नागरिक हैं। क्या कानून अब उसी निष्पक्षता से अपना काम करेगा जिसकी उम्मीद एक आम भारतीय करता है? न्यायपालिका की शुचिता बनाए रखने के लिए इस मामले का तार्किक अंजाम तक पहुंचना अनिवार्य है।