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कविता : “मेरी अम्मी का चश्मा” शेख जमीरुल हक खान चौधरी



मेरी अम्मी का चश्मा,
कुछ खास सा लगता है,
उनकी आँखों का उजाला
इसमें जैसे बसता है।

जब वो इसे पहनती हैं,
दुनिया साफ दिखती है,
हर छोटी सी गलती भी
उन्हें तुरंत दिखती है।

कभी ढूँढती रहती हैं,
सिर पर ही रखा होता,
फिर हँसकर कहती हैं—
"बेटा, यहीं तो था छोटा!"

इस चश्मे के पीछे ही
उनकी ममता छुपी है,
डाँट में भी प्यार भरा,
हर बात में खुशी है।

जब वो मुझे देखती हैं,
इस चश्मे के सहारे,
लगता है दुआएँ देती
हर पल मुझे वो प्यारे।

मेरी अम्मी का चश्मा,
बस एक चीज़ नहीं है,
मेरे जीवन की रोशनी,
उनकी ममता यहीं है।

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