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पटोरी में किताबों के नाम पर लूट । शिक्षा या व्यापार ? मजबूरी में मध्यम वर्ग ।

बिहार के समस्तीपुर जिला अंतर्गत शाहपुर पटोरी जैसे क्षेत्रों में आज एक अजीब सा विरोधाभास देखने को मिल रहा है। सरकारी स्कूलों की दीवारें अब "BPSC" से आए मेधावी शिक्षकों की ज्ञान-रश्मियों से चमक तो रही हैं, लेकिन उन कमरों के भीतर का 'सामाजिक वातावरण' आज भी एक सभ्य समाज के माता-पिता को डरा रहा है। यह लेख उस "डर" की गहराई और शिक्षा व्यवस्था की विडंबना का एक मर्मस्पर्शी विश्लेषण है।

यह सच है कि सरकारी स्कूलों के पास आज बिहार के सबसे काबिल शिक्षक हैं। लेकिन शिक्षा केवल किताबों तक सीमित नहीं होती। बच्चा स्कूल में केवल गणित या विज्ञान नहीं सीखता, वह अपने सहपाठियों से भाषा, लहजा और जीवन जीने का सलीका भी सीखता है। पटोरी के एक जागरूक अभिभावक की चिंता यहीं से शुरू होती है:

जागरूक माता-पिता को डर है कि कहीं उनका बच्चा उन बच्चों के बीच रहकर अपशब्द या अभद्र भाषा न सीख ले, जिनके घरों में शिक्षा का अभाव है।

एक तरफ घर का अनुशासित माहौल है और दूसरी तरफ स्कूल का वह अनियंत्रित समूह, जहाँ अनुशासन की डोर ढीली है। यह डर जायज है कि कहीं 'अक्षर ज्ञान' पाने की प्रक्रिया में बच्चा 'आचरण' न खो दे।

निजी स्कूल शिक्षा नहीं बेच रहे, वे एक "सुरक्षित माहौल" बेच रहे हैं। वे जानते हैं कि मध्यम वर्ग अपने बच्चे को गाली सीखते नहीं देख सकता। इसी 'डर' की कीमत वे महंगी किताबों, अनिवार्य ड्रेस कोड और मनमानी फीस के रूप में वसूलते हैं।

अभिभावक जानते हैं कि उन्हें लूटा जा रहा है। उन्हें पता है कि निजी स्कूल का शिक्षक उनके सरकारी स्कूल वाले शिक्षक से कम योग्य है। फिर भी, वे यह लूट सहते हैं ताकि उनके बच्चे को एक 'साफ-सुथरी संगत' मिल सके। यह शिक्षा का बाजारीकरण नहीं, बल्कि मध्यम वर्ग की विवशता है।


सबसे मर्मस्पर्शी दृश्य तब होता है जब एक सरकारी शिक्षक अपनी ड्यूटी पूरी करने के बाद अपने स्वयं के बच्चे को किसी निजी कॉन्वेंट के गेट पर छोड़ने जाता है। यह इस बात का सीधा प्रमाण है कि हमें व्यवस्था पर तो भरोसा है, पर उस व्यवस्था के भीतर पनप रहे "सामाजिक परिवेश" पर नहीं।

BEO और DEO जैसे अधिकारियों की चुप्पी इस लूट को खाद-पानी देती है, जिससे एक आम आदमी खुद को अकेला और ठगा हुआ महसूस करता है।

अगर सरकारी स्कूलों को बचाना है, तो उन्हें केवल "मिड-डे मील" के केंद्र से ऊपर उठाकर 'संस्कार केंद्रों' में बदलना होगा:

स्कूल में आते ही हर बच्चा एक समान दिखे। जब तक ड्रेस और सफाई अनिवार्य नहीं होगी, तब तक 'वर्ग भेद' (Class Difference) बना रहेगा।

अभिभावक-शिक्षक संवाद (PTM): सरकारी स्कूलों में भी शिक्षित और जागरूक माता-पिता की भागीदारी जरूरी है। जब तक समाज का प्रभुत्वशाली वर्ग सरकारी स्कूल से दूरी बनाए रखेगा, वहां का माहौल कभी नहीं सुधरेगा। केवल पाठ्यक्रम पूरा करना काफी नहीं है। बच्चों को भाषा, आचरण और व्यवहार की विशेष ट्रेनिंग देनी होगी, ताकि किसी भी पृष्ठभूमि का बच्चा सभ्य समाज का हिस्सा बन सके।

अंत में एक कड़वा सच ये है कि
पटोरी की सड़कों पर महंगे बस्ते टांगे बच्चों की भीड़ यह नहीं बता रही कि हमारा समाज समृद्ध हो रहा है, बल्कि यह बता रही है कि हमारी सरकारी व्यवस्था एक "बेहतर परिवेश" देने में नाकाम रही है।

"शिक्षा अगर सिर्फ किताबों में होती, तो गूगल सबसे बड़ा गुरु होता। शिक्षा तो वह है जो आचरण में दिखे। जिस दिन सरकारी स्कूल का बच्चा अपनी भाषा और व्यवहार से किसी निजी स्कूल के बच्चे को मात दे देगा, उस दिन मध्यम वर्ग की यह मजबूरी और निजी स्कूलों की यह दुकानदारी, दोनों खत्म हो जाएगी।"

यह समय विलाप करने का नहीं, बल्कि सरकारी स्कूलों में 'शिक्षा' के साथ-साथ 'सभ्यता' की बहाली के लिए एक जन-आंदोलन खड़ा करने का है। तभी बिहार का मध्यम वर्ग इस आर्थिक और मानसिक बेड़ियों से आजाद हो पाएगा।

मनीष सिंह
शाहपुर पटोरी
@ManishSingh_PT

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