पलामू के शिक्षक का पोस्ट वायरल, प्राइवेट स्कूलों की मनमानी और सरकारी सिस्टम पर तीखे सवाल
मेदिनीनगर : पलामू के शिक्षक प्रवीण दुबे द्वारा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Facebook पर किया गया एक पोस्ट इन दिनों तेजी से वायरल हो रहा है। इस पोस्ट में उन्होंने प्राइवेट स्कूलों की बढ़ती मनमानी और अतिरिक्त शुल्क के मुद्दे को गंभीरता से उठाते हुए सरकारी विद्यालयों की स्थिति पर भी कई अहम सवाल खड़े किए हैं।
प्रवीण दुबे ने अपने पोस्ट में अपील करते हुए कहा है कि समाज के जागरूक नागरिकों को एकजुट होकर शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए आगे आना चाहिए। उन्होंने यहां तक प्रस्ताव रखा कि पूरे देश में प्राइवेट स्कूलों को बंद कर सरकारी विद्यालयों को मजबूत किया जाए, ताकि आम जनता का विश्वास फिर से सरकारी शिक्षा प्रणाली पर लौट सके।
हालांकि, अपने ही प्रस्ताव के साथ उन्होंने कई महत्वपूर्ण सवाल भी उठाए। उन्होंने पूछा कि आखिर सक्षम वर्ग के लोग अपने बच्चों का नामांकन सरकारी स्कूलों में क्यों नहीं कराते। साथ ही, सरकार द्वारा संचालित “स्कूल ऑफ एक्सीलेंस” में बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर और अनुभवी शिक्षकों के बावजूद नामांकन में अपेक्षित बढ़ोतरी क्यों नहीं हो रही है।
पोस्ट में उन्होंने सरकारी विद्यालयों की जमीनी समस्याओं को भी विस्तार से उठाया, जिनमें स्वच्छ पेयजल की कमी, विद्यालय का वातावरण, शिक्षकों की संख्या, सिलेबस अपडेट, प्रयोगशालाओं का संचालन, अनुशासन व्यवस्था, खेल मैदान और अन्य बुनियादी सुविधाओं की कमी शामिल हैं। उन्होंने यह भी सवाल किया कि साल भर में सिलेबस पूरा क्यों नहीं हो पाता और परीक्षा परिणाम राज्य व राष्ट्रीय स्तर पर बेहतर क्यों नहीं दिखते।
प्रवीण दुबे ने यह भी कहा कि यदि सरकार इन सभी व्यवस्थाओं को गंभीरता से सुधार दे, तो एक दिन ऐसा भी आ सकता है जब लोग स्वेच्छा से अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ाना पसंद करेंगे। उन्होंने कुछ जनप्रतिनिधियों और समाज के प्रभावशाली लोगों पर भी निशाना साधते हुए कहा कि वे स्वयं अपने बच्चों को निजी स्कूलों में पढ़ाते हैं, लेकिन सरकारी विद्यालयों की समस्याओं पर आवाज़ नहीं उठाते।
पोस्ट के अंत में उन्होंने स्पष्ट किया कि शिक्षकों को “माफिया” कहना गलत है और यदि कहीं गड़बड़ी है तो उसे प्रमाणित कर समाज के सामने लाया जाना चाहिए।
यह पोस्ट सोशल मीडिया पर तेजी से शेयर किया जा रहा है और शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। स्थानीय स्तर पर अभिभावकों, शिक्षकों और सामाजिक संगठनों के बीच इस मुद्दे पर चर्चा तेज हो गई है।