श्रेष्ठ और सक्षम पत्रकार राष्ट्र का नाम होता है
*श्रेष्ठ और सक्षम पत्रकार राष्ट्र का नेता होता है* : गणेश शंकर विद्यार्थी
*पत्रकारों में अन्याय के विरुद्ध डट जाने और न्याय के लिए आफ़तों को बुलाने की चाह न रहेगी*
निर्मल सिंह / पानीपत
गणेश शंकर विद्यार्थी का जन्म इलाहाबाद में सन् 1890 में हुआ। उन्होंने कानपुर में अध्यापन कार्य करते समय क्रान्तिकारी सुंदर लाल के 1901 में अंक को ध्यान से पढ़ा।
गणेश जी " प्रताप " पत्रिका में प्रतिदिन की सामग्री को देखते और दूसरे दिन के लिए निर्देश देते। उनकी पत्रकारिता में सम्पादन कला तथा कार्य पद्धति का स्तर उच्च कोटि का था। वे प्रायः बोलकर अग्रलेख या टिप्पणी लिखवाया करते। इसके लिए पहले एक बड़े कागज़ पर सामग्री लिख लेते। अपने सहयोगी संपादकों की सामग्री का सम्पादन करते समय विद्यार्थी जी लाल स्याही से पत्र को रंग डालते। वे सामग्री में इतनी कांट छांट कर देते। समग्र लेख का स्वरूप ही बदल जाता।
उनका कहना था , कि श्रेष्ठ और सक्षम पत्रकार राष्ट्र का नेता होता है । लोक सेवा ही संपादक का धर्म है ।
उन्होंने पत्रकार और पत्रकारिता के विविध पक्षों पर प्रकाश डाला । मैं पत्रकार को सत्य का प्रहरी मानता हूं । सच को प्रकाशित करने के लिए वह मोमबत्ती की भांति जलता है । सत्य के साथ उसका वही नाता है , जो एक पतिव्रता स्त्री का अपने पति के साथ रहता है । पतिव्रता स्त्री पति के शव के साथ शहीद होती है, और पत्रकार सत्य के शव के साथ । पत्रकार समाज का सश्रेष्टा होता है। केवल समाचार देना और पैसा कमाना । इस प्रकार पैसा कमाना पाप है। समस्त मानव जाति का कल्याण हमारा परम उद्देश्य है । इस उद्देश्य की प्राप्ति का एक बहुत बड़ा और बहुत जरूरी साधन हम भारत वर्ष की उन्नति समझते हैं।
इस देश में समाचार पत्रों का आदर्श धन हो रहा है। पत्र धन से ही वे निकलते हैं । धन के आधार पर ही वे चलते हैं । और बड़ी वेदना के साथ कहना पड़ रहा है , कि उनमें काम करने वाले बहुत से पत्रकार धन की अभ्यर्थना करते हैं । अभी यहां पूरा अंधकार नहीं हुआ। किंतु लक्षण वैसे ही है । कुछ समय के पश्चात यहां के समाचार पत्र भी मशीनों के सदृश हो जाएंगे और उनमें काम करने वाले पत्रकार मशीन के पुर्जे । पत्रकारों में व्यक्तित्व न रहेगा , सत्य और असत्य का अंतर न रहेगा । अन्याय के विरुद्ध डट जाने और न्याय के लिए आफ़तों को बुलाने की चाह न रहेगी और रह जाएगा केवल खींची हुई लकीर । मैं तो उस अवस्था को अच्छा नहीं कह सकता ।