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“जनता परेशान, जनप्रतिनिधि मौन—आखिर कब होगी सुनवाई?”

महानगर गाजियाबाद की आम जनता आज दोहरी मार झेल रही है। एक ओर नगर निगम के बढ़े हुए हाउस टैक्स ने लोगों की कमर तोड़ दी है, तो दूसरी ओर स्मार्ट मीटर और प्रीपेड बिजली व्यवस्था ने नई परेशानियाँ खड़ी कर दी हैं। इन ज्वलंत मुद्दों के बीच सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि आखिर जनप्रतिनिधियों की भूमिका क्या रह गई है—जनसेवा या सिर्फ रिबन काटने और स्वागत समारोहों तक सीमित रह जाना?
चुनाव के समय जनता से बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं। जनप्रतिनिधि जनता के हितों की रक्षा करने और उनकी समस्याओं को प्राथमिकता से हल कराने का भरोसा दिलाते हैं। लेकिन चुनाव जीतने के बाद वही जनप्रतिनिधि जनता की समस्याओं से दूरी बनाते नजर आते हैं। आज स्थिति यह है कि पार्षद से लेकर विधायक, मेयर और सांसद तक सभी एक ही दल से होने के बावजूद जनता को राहत दिलाने में सक्रिय नहीं दिख रहे हैं।
हाउस टैक्स के मुद्दे पर यदि सभी जनप्रतिनिधि एकजुट होकर मुख्यमंत्री से मिलते और ठोस पहल करते, तो अब तक इस समस्या का समाधान निकल सकता था। पूर्व में अपने हितों के लिए इस प्रकार की पहल की जा चुकी है, तो फिर जनता के हितों के लिए एकजुटता क्यों नहीं दिखाई जा रही? यह प्रश्न हर नागरिक के मन में उठ रहा है।
स्थिति और भी विडंबनापूर्ण तब हो जाती है जब एक ओर यह कहा जाता है कि पुराना हाउस टैक्स ही लागू होगा, तो दूसरी ओर नया टैक्स लागू कर दिया जाता है। यदि पुरानी व्यवस्था ही उचित थी, तो नई व्यवस्था लागू करने की जल्दबाजी क्यों की गई? हाउस टैक्स में वृद्धि स्वाभाविक है, लेकिन यह वृद्धि इतनी अधिक नहीं होनी चाहिए कि आम आदमी के लिए बोझ असहनीय हो जाए। गाजियाबाद में प्रदेश के अन्य शहरों की तुलना में अधिक हाउस टैक्स लगाया जाना भी कई सवाल खड़े करता है।
इसी बीच स्मार्ट मीटर और प्रीपेड बिजली व्यवस्था ने आम लोगों की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। बिना पर्याप्त तैयारी और जागरूकता के इस व्यवस्था को लागू कर दिया गया। लोगों को न तो सही जानकारी दी गई और न ही तकनीकी सुविधाएँ सुचारू रूप से उपलब्ध कराई गईं। नतीजा यह हुआ कि कई उपभोक्ताओं की बिजली आपूर्ति बाधित हो गई और उन्हें बिजली घरों के चक्कर लगाने पड़े। मोबाइल ऐप की तकनीकी खामियों ने स्थिति को और जटिल बना दिया।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि इन समस्याओं के समाधान के लिए जनता को अपने ही चुने हुए प्रतिनिधियों के पास गुहार लगानी पड़ रही है, लेकिन वहां से भी अपेक्षित सहयोग नहीं मिल पा रहा है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर जनता ने अपने प्रतिनिधियों को किस उद्देश्य से चुना था?
जनप्रतिनिधियों का कर्तव्य केवल औपचारिक कार्यक्रमों में भाग लेना या स्वागत करवाना नहीं है, बल्कि जमीनी स्तर पर जनता की समस्याओं को समझना और उनके समाधान के लिए ठोस कदम उठाना है। समय की मांग है कि जनप्रतिनिधि अपनी जिम्मेदारियों को गंभीरता से निभाएं और जनता के विश्वास पर खरा उतरें।
अन्यथा, लोकतंत्र में जनता के पास सबसे बड़ा अधिकार है—समय आने पर जवाब देने का।
संजय शर्मा, वरिष्ठ समाजसेवी

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