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छोटे गैस सिलेंडर की कालाबाजारी चरम पर, महानगरों में मजदूर वर्ग पर बढ़ता संकट

देश के बड़े महानगरों में रहने वाले मजदूरों और अकेले जीवन यापन कर रहे लोगों के लिए रसोई गैस एक बड़ी समस्या बनती जा रही है। जहां नियमित गैस कनेक्शन रखने वाले उपभोक्ताओं को कुछ हद तक राहत है, वहीं बिना कनेक्शन के छोटे 5 किलो सिलेंडर (पेट्रोमैक्स) पर निर्भर लोगों की मुश्किलें लगातार बढ़ रही हैं।
पहले यह सिलेंडर ब्लैक में करीब 100 रुपये प्रति किलो तक मिल जाता था, जिससे मजदूर वर्ग किसी तरह अपना गुजारा कर लेता था। लेकिन अब कालाबाजारी अपने चरम पर पहुंच चुकी है और यही गैस 400 से 500 रुपये प्रति किलो तक बेची जा रही है, जो आम आदमी की पहुंच से बाहर हो गई है।
इस बढ़ती महंगाई और अव्यवस्था के चलते दिहाड़ी मजदूर, प्रवासी कामगार और अकेले रहने वाले लोग सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। कई लोग मजबूरी में अपने काम छोड़कर वापस गांवों की ओर पलायन करने पर विचार कर रहे हैं।
स्थिति को देखते हुए जरूरत है कि सरकार इस वर्ग के लिए भी विशेष नीति बनाए, ताकि उन्हें सस्ती और सुलभ रसोई गैस उपलब्ध हो सके। यदि समय रहते इस समस्या का समाधान नहीं किया गया, तो इसका असर शहरी श्रम व्यवस्था और आम जनजीवन पर भी गंभीर रूप से पड़ सकता है।

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