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पुरानी तस्वीर की यादें: संघर्ष, समर्पण और जीत की कहानी (1996 लोकसभा चुनाव, जमशेदपुर)

जमशेदपुर की राजनीतिक यात्रा के इतिहास में साल 1996 का लोकसभा चुनाव एक यादगार अध्याय के रूप में दर्ज है। यह सिर्फ एक चुनाव नहीं था, बल्कि संघर्ष, साहस और संगठन की ताकत की मिसाल भी था।

उस दौर में लोकप्रिय टीवी सीरियल महाभारत में भगवान कृष्ण की भूमिका निभाकर घर-घर में प्रसिद्ध हुए नितीश भारद्वाज को भारतीय जनता पार्टी ने जमशेदपुर से अपना प्रत्याशी बनाया था। जब वे पहली बार जमशेदपुर पहुंचे, तो एक भावुक क्षण देखने को मिला—वे काशीडीह स्थित लेखक के घर उनके पिता के 13वीं श्राद्ध भोज में शामिल हुए।

उस समय लेखक स्वयं युवा मोर्चा के प्रदेश पदाधिकारी थे और संघ द्वारा उन्हें नितीश भारद्वाज के चुनाव सहयोगी के रूप में जिम्मेदारी दी गई थी। व्यक्तिगत शोक के बावजूद, पिता के निधन के महज 15 दिनों बाद ही वे चुनावी मैदान में उतर गए—जो उनके समर्पण और हिम्मत को दर्शाता है।

इस चुनाव में मुकाबला आसान नहीं था। सामने थे राजद के दिग्गज नेता इंदर सिंह नामधारी। वहीं कई ग्रामीण इलाकों में झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) का गहरा प्रभाव और दबदबा था। इसके बावजूद भाजपा कार्यकर्ताओं के जोश और रणनीति के दम पर पार्टी ने गांव-गांव तक अपनी पहुंच बनाई और अंततः जीत हासिल की।

इस तस्वीर में दिख रही मुस्कान उस कठिन संघर्ष के बाद मिली जीत की गवाही देती है। लेखक के दाईं ओर बैठे एक दुबले-पतले युवक—जादूगोड़ा के मनोज प्रताप सिंह—उन हजारों युवा कार्यकर्ताओं का प्रतीक हैं, जिनके जोश, तेवर और समर्पण ने भाजपा को ग्रामीण क्षेत्रों में मजबूत आधार दिलाया।

यह तस्वीर सिर्फ एक पल नहीं, बल्कि उस दौर के जज्बे, संघर्ष और राजनीतिक समर्पण की जीवंत कहानी है—जो आज भी प्रेरणा देती है।

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