कहानी : "अमानत" : चौथा अध्याय : शेख जमीरुल हक खान चौधरी
अध्याय 4 — अमानत की हिफाज़त
बिस्मिल्लाहपुर की पुरानी सराय, जो बरसों से वीरान पड़ी थी, आज रौशनी से चमक उठी थी।
दीवारों पर limewash का नया रंग था, फर्श पर नई दरियाँ बिछी थीं, और आंगन में रखी एक बड़ी सी हांडी में रहमत अली खिचड़ी पका रहा था।
यही वह जगह थी जहां अब्दुल ने उन छब्बीस लड़कियों को नई ज़िंदगी देने की ठानी थी।
रहमत अली धीरे से बोला —
“हुज़ूर, क्या लोग इन बच्चियों को अपनाएंगे?”
अब्दुल ने आसमान की तरफ देखा और बोला —
“अगर दुनिया ना भी अपनाए, तो क्या हुआ?
जब तक ये सांसें चलेंगी, मैं इनकी अमानत का रखवाला बना रहूंगा।”
लेकिन दुनिया कब इतनी आसान होती है?
कुछ ही दिनों में शहर में कानाफूसी शुरू हो गई —
“अब्दुल ने कोठे की लड़कियों को सराय में रखा है।”
“कहीं ये भी धंधे में तो नहीं उतर गया?”
“छुपा माफिया है वो… बाहर भला, भीतर काला।”
अब्दुल चुप रहा, क्योंकि उसे पता था —
इंसानियत की राह पर चलने वाला अक्सर तन्हा होता है।
मगर एक दिन जब एक लड़की, ज़ीनत, जो सिर्फ 15 साल की थी, दरवाज़े के बाहर खड़ी होकर रो रही थी और कह रही थी —
“चाचा, मैं स्कूल जाना चाहती हूँ…”
तो अब्दुल ने उसी पल फैसला किया।
“अब ये अमानतें सिर्फ सराय में नहीं रहेंगी,
ये स्कूल जाएंगी, किताबें पढ़ेंगी,
और इस दुनिया को बताएंगी कि इज़्ज़त खरीदी नहीं जाती — जीकर कमाई जाती है।”
अब्दुल खुद गया उस सरकारी स्कूल के प्रिंसिपल से मिलने।
प्रिंसिपल ने पूछा —
“ये कौन हैं?”
अब्दुल ने कहा —
“ये मेरी अमानतें हैं।”
“और अगर लोग आपसे सवाल करें?”
“तो जवाब मैं दूंगा — इंसानियत के नाम पर।”
“और अगर अफजल कबीर को पता चला?”
“तो उसे भी यहीं आकर देखना होगा —
कि उसकी तिजारत से बची ज़िंदगियाँ अब किताबें पढ़ रही हैं।”
उसी शाम, ज़ीनत और बाकी लड़कियाँ पहली बार यूनिफॉर्म पहनकर स्कूल गईं।
कांपते कदमों में हिम्मत थी।
झुकी निगाहों में उम्मीद थी।
और दिलों में अब्दुल का नाम एक रखवाले की तरह दर्ज हो चुका था।
बिस्मिल्लाहपुर के इतिहास में पहली बार, एक आदमी ने ना सिर्फ लड़कियों को बचाया —
बल्कि उन्हें इंसान बनने का हक़ भी दिया।