कहानी : "अमानत" : दूसरा अध्याय : शेख जमीरुल हक खान चौधरी
अध्याय 2 — टकराव
रात गहरी थी, मगर अब्दुल वाहिद खान की आँखों में उजाला भरा था। उसकी सांसें तेज़ थीं, मगर इरादे ठोस। बिस्मिल्लाहपुर की सरहद से कुछ मील दूर, एक सुनसान सड़क पर एक भारी-भरकम कंटेनर अपने काले राज़ के साथ दौड़ रहा था।
रहमत अली ने जीप रोकी और दूर से इशारा किया — "हुज़ूर, वो रहा कंटेनर।"
अब्दुल ने अपनी छड़ी से ज़मीन पर ज़ोर देते हुए जीप से उतरकर सामने खड़ा हो गया — बिल्कुल सड़क के बीचों-बीच।
कंटेनर अचानक ब्रेक के साथ रुका। धूल उड़ी, और अगले ही पल ड्राइवर ने खिड़की खोलकर चिल्लाया —
“कौन है बे?”
अब्दुल ने गहरी सांस ली, और कहा —
“अब्दुल।”
सहायक ड्राइवर ने आँखें मिचमिचाते हुए पूछा —
“कौन अब्दुल?”
“अब्दुल वाहिद खान।
अल्लाह पर वाहिद ईमान रखने वाला
सच्चा मुत्तकी मुसलमान।”
ड्राइवर और उसका साथी हँसे —
“तो फिर खेलते हैं एक खेल।”
ड्राइवर ने उतरते हुए कहा —
“ईमानदार हो, तो डरते क्यों हो?”
अब्दुल ने जवाब दिया —
“मुत्तकी अल्लाह के सिवा किसी से नहीं डरता।”
कंटेनर फिर से स्टार्ट हुआ।
ड्राइवर ने जानबूझकर उसे अब्दुल की तरफ बढ़ाया।
लेकिन अब्दुल वहीं खड़ा रहा — एक पैर पर टिके, छड़ी जमीन पर गड़ी, और आंखें आसमान की तरफ उठी हुईं।
“अल्लाह हू अकबर!”
उसके लबों से निकला, जैसे बिजली गिरी हो।
कंटेनर कुछ ही इंच की दूरी पर आकर रुक गया।
ड्राइवर का चेहरा सफेद पड़ गया।
सहायक भागने लगा, लेकिन रहमत अली ने उसे दबोच लिया।
अब्दुल ने ड्राइवर को गर्दन से पकड़ा और कहा —
“जिसके पेट में अमानत हो, उसका पेट नहीं चीरते।
मगर जिसकी गाड़ी में इंसानियत बंद हो, उसे छोड़ना भी गुनाह होता है।”
दोनों को पास के एक पेड़ से बाँध दिया गया।
अब्दुल ने कंटेनर का ताला तोड़ा।
जैसे ही दरवाज़ा खुला, भीतर से एक सिसकी उभरी।
घुटी हुई आवाज़ें, डरी हुई आँखें, और कांपती रूहें।
छब्बीस लड़कियाँ।
छब्बीस सांसें।
छब्बीस अमानतें।
अब्दुल ने एक-एक को बाहर निकाला।
उनकी आँखों में रोशनी लौटी।
एक छोटी बच्ची ने अब्दुल का हाथ पकड़ते हुए पूछा —
“चाचा, आप कौन हैं?”
अब्दुल ने सिर पर हाथ रखते हुए कहा —
“मैं?
बस… एक इंसान।
जो इंसानियत का कर्ज़ चुका रहा है।”