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कविता: जब मैं था पापा के छांव तले : शेख जमीरुल हक खान चौधरी

जब मैं था पापा के छांव तले,
हर डर मुझसे दूर हुआ करता था,
छोटी-छोटी बातों में भी,
दिल खुशियों से भर जाता था।

उनकी उंगली थाम के मैंने,
चलना पहली बार सीखा,
गिर कर फिर से उठ जाना,
जीने का हर सार सीखा।

धूप भी मुझ तक आती थी,
तो पहले उनसे टकराती थी,
मेरी हर एक तकलीफ को,
उनकी ममता सह जाती थी।

जब मैं था पापा के छांव तले,
ना कोई चिंता, ना कोई ग़म,
दुनिया कितनी आसान लगे,
जब साथ हो उनका हर दम।

अब जब राहों में हूँ तन्हा,
याद उनकी सहारा बनती है,
उनकी सीख और उनकी बातें,
मेरी ताकत बन जाती है।

पापा की वो साया जैसे,
अब भी मुझको ढक लेता है,
उनके होने का एहसास ही,
हर मुश्किल को हल करता है।

जब मैं था पापा के छांव तले,
वो बचपन कितना प्यारा था,
आज भी दिल ये कहता है—
वो वक्त ही सबसे न्यारा था।

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