हे मन ! आओ लौट चलें अब
बचा अब कुछ भी शेष नहीं है
हे मन ! आओ लौट चलें अब
बचा अब कुछ भी शेष नहीं है
ऐसों को क्या ही समझाना जिनको कुछ भी समझ न आये।
नेह से ज्यादा देह के उपवन की जिनको हरियाली भाये।
कब तक याचक बने रहोगे यूं कब तक उपहास सहोगे ?
एक काल्पनिक खुशी के खातिर कब तक तुम अवसाद सहोगे ?
बहुत हो चुका प्रणय निवेदन
उनसे कोई द्वेष नहीं है।
वो दिन बीते जब वो सारी बात तुम्हारी सुनते थे।
सपनों की झीनी चादर को साथ में मिलकर बुनते थे।
चूड़ी , कंगन ,पायल से भी तुम जब उन्हें संवारे थे।
वो दिन बीते ओ चंचल मन ! जब वो सिर्फ तुम्हारे थे।
संबंधों के रंगमंच पर
बाकी कोई भेष नहीं है।
हृदय ! अभी बस धैर्य धरो तुम सही समय की करो प्रतीक्षा।
अभी तुम इतने योग्य नहीं हो कि तुम उन पर करो समीक्षा।
अपने और परायेपन का माना उनको ज्ञान नहीं है।
इसका मतलब यह मत समझो सही लत का भान नहीं है।
अधर मौन हो जाओ अब तुम
शेष कोई उपदेश नहीं है। 💞
लेखिका नीलम नीलू