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कविता या रसूल्लाह शेख जमीरुल हक खान चौधरी

या रसूल्लाह तेरा नूरानी चेहरा,
देखने को तरस रहा है,
मोमिन दिल सारा।

ख्वाब में ही तू,
दीदार करा दे उनको,
पता नहीं है जिनको,
तेरे जलवे का।
या रसूल्लाह तेरा दामन से रिश्ता,
जोड़ने को तरस रहा है,
मोमिन दिल सारा।

हुक्म-ए- इलाही से जब,
तेरी हुई पहचान,
तू देने लगा सबको,
ईमान का पैगाम।
या रसूल्लाह तेरा अल्लाह से रिश्ता,
देखने को तरस रहा है,
मोमिन दिल सारा।

जुल्म कितने ढाये,
जालिमों ने तूझ पर,
झेला तूने उनको,
सब्र के दम पर।
या रसूल्लाह तेरा सब्र से नाता,
जोड़ने को तरस रहा है,
मोमिन दिल सारा।

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