जब दवाइयां रुक जाए और राजस्थान सरकार मौन रहे -RGHS संकट पर कब जागेगा राजस्थान
राजस्थान की स्वास्थ्य व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण स्तंभ रही RGHS आज अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रही है। यह वही योजना है, जिसे कभी सरकारी कर्मचारियों और पेंशनर्स के लिए “निःशुल्क और सम्मानजनक इलाज की गारंटी” बताया गया था। लेकिन आज हकीकत यह है कि इसी योजना के लाभार्थी—विशेषकर बुजुर्ग पेंशनर्स—अपनी दवाइयों और इलाज के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं।
समस्या केवल तकनीकी या प्रशासनिक नहीं है; यह एक गहरी व्यवस्थागत विफलता का संकेत है। आंकड़े बताते हैं कि निजी अस्पतालों और दवा विक्रेताओं पर सरकार का करीब ₹1,800 करोड़ बकाया है। भुगतान में 8 से 10 महीनों की देरी ने हालात को इस कदर बिगाड़ दिया है कि Rajasthan Alliance of Hospital Associations (RAHA) को 25 मार्च 2026 से कैशलेस दवा वितरण रोकने का कठोर निर्णय लेना पड़ा।
लेकिन इस संकट का एक और महत्वपूर्ण और संवेदनशील पहलू है, जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है—मेडिकल स्टोर्स की पीड़ा।
जो मेडिकल स्टोर अब तक RGHS के अंतर्गत पेंशनर्स को भरोसे के साथ दवाइयाँ उपलब्ध करा रहे थे, वे आज स्वयं आर्थिक संकट में हैं। सरकार से रीइम्बर्समेंट (भुगतान) न मिलने के कारण उनका पूंजी चक्र टूट चुका है। महीनों से फंसे भुगतान ने उन्हें ऐसी स्थिति में ला खड़ा किया है कि अब वे दवाइयाँ देने में असमर्थ हो रहे हैं।
सोचिए, एक ओर पेंशनर दवा के लिए परेशान है, और दूसरी ओर दवा देने वाला भी मजबूर—यह केवल एक सिस्टम फेल्योर नहीं, बल्कि पूरी स्वास्थ्य श्रृंखला (healthcare chain) का टूटना है।
इस संकट का सबसे क्रूर असर उन लोगों पर पड़ रहा है, जिन्होंने अपने जीवन का स्वर्णिम समय सरकारी सेवा में दिया। आज वही पेंशनर्स, जिनके लिए RGHS सुरक्षा कवच होना चाहिए था, दवाइयों के लिए मेडिकल स्टोर से मेडिकल स्टोर तक भटक रहे हैं। किसी के पास ब्लड प्रेशर की दवा नहीं है, किसी की डायबिटीज की दवा छूट रही है, तो कोई हार्ट पेशेंट समय पर इलाज न मिलने के कारण जोखिम में है।
क्या यह केवल “असुविधा” है? नहीं—यह सीधे-सीधे जीवन के अधिकार पर प्रहार है।
सरकार की चुप्पी इस संकट को और गहरा बना रही है। सवाल यह नहीं है कि समस्या क्यों आई—सवाल यह है कि अब तक समाधान क्यों नहीं निकला? क्या ₹1,800 करोड़ का बकाया इतना असंभव है कि महीनों तक पेंशनर्स और सेवा प्रदाताओं दोनों को संकट में डाला जाए? या फिर यह प्राथमिकताओं का संकट है, जहाँ बुजुर्गों की सेहत और छोटे व्यापारियों की आजीविका, दोनों ही फाइलों के नीचे दब गई हैं?
हकीकत यह है कि RGHS जैसी योजनाएँ केवल बजट से नहीं चलतीं, बल्कि विश्वास से चलती हैं। और जब अस्पतालों को समय पर भुगतान नहीं मिलता, तो उनका भरोसा टूटता है। जब मेडिकल स्टोर्स को उनका पैसा नहीं मिलता, तो उनका व्यवसाय डगमगाता है। और जब मरीज को कैशलेस सुविधा नहीं मिलती, तो उसका जीवन संकट में पड़ता है। जब सरकार इन तीनों के बीच मौन रहती है, तो पूरी व्यवस्था का भरोसा ढह जाता है।
समाधान असंभव नहीं हैं—जरूरत है इच्छाशक्ति की।
सरकार यदि चाहे तो तत्काल 50% बकाया जारी कर सकती है—अस्पतालों के साथ-साथ मेडिकल स्टोर्स के लिए भी। शेष भुगतान के लिए निश्चित समय-सीमा तय की जाए, क्लेम प्रोसेसिंग को पूरी तरह डिजिटल व पारदर्शी बनाया जाए, और RGHS के लिए एक “रिंग-फेंस्ड बजट” सुनिश्चित किया जाए।
साथ ही, जब तक कैशलेस व्यवस्था पूरी तरह बहाल नहीं होती, तब तक अस्थायी रूप से पुनर्भरण (reimbursement) मॉडल लागू कर मरीजों को राहत दी जा सकती है।
लेकिन यह सब तभी होगा, जब सरकार इस संकट को “सामान्य प्रशासनिक समस्या” नहीं, बल्कि मानवीय और आर्थिक आपातकाल के रूप में देखे—जहाँ पेंशनर्स का स्वास्थ्य और छोटे व्यवसायियों की आजीविका दोनों दांव पर हैं।
अब प्रश्न केवल सरकार से नहीं, समाज से भी है।
क्या हम तब तक चुप रहेंगे, जब तक यह संकट हर घर तक नहीं पहुँच जाता?
क्या पेंशनर्स और मेडिकल स्टोर्स की यह पीड़ा केवल उनकी व्यक्तिगत समस्या है, या यह पूरे समाज की जिम्मेदारी है?
समय आ गया है कि पेंशनर्स, उनके परिवार, और जागरूक नागरिक मिलकर इस मुद्दे को उठाएँ। शिकायत दर्ज करें, जनप्रतिनिधियों को लिखें, और इस मुद्दे को हर मंच पर ले जाएँ। क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ी ताकत आवाज की होती है—और जब आवाज सामूहिक हो, तो सत्ता को सुनना ही पड़ता है।
अंततः, यह याद रखना होगा कि RGHS केवल एक योजना नहीं है—
यह उन लाखों लोगों के जीवन की सुरक्षा का वादा है, जिन्होंने अपने जीवन का सर्वश्रेष्ठ समय इस राज्य की सेवा में लगाया है।
यदि यह वादा टूटता है, तो केवल एक योजना नहीं टूटेगी—
टूटेगा भरोसा, टूटेगा सम्मान, और टूटेगी उस व्यवस्था की आत्मा—जिसे संभालना अब सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।