"भ्रष्टाचार पर बड़ा प्रहार: 19 साल बाद मिला न्याय!"
उप-सुर्ख़ी: डेहरी नगर परिषद के तत्कालीन प्रधान लिपिक कृष्णदेव पासवान को जेल और जुर्माना।
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विजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार
पटना/डेहरी: बिहार में भ्रष्टाचार के खिलाफ 'जीरो टॉलरेंस' की नीति का एक और बड़ा उदाहरण सामने आया है। निगरानी अन्वेषण ब्यूरो (Vigilance Investigation Bureau) की सतर्कता और न्यायिक प्रक्रिया की दृढ़ता ने यह साबित कर दिया है कि सरकारी कुर्सी पर बैठकर जनता की जेब काटने वालों के लिए कानून के घर में कोई जगह नहीं है।
हाल ही में माननीय न्यायालय द्वारा कृष्णदेव पासवान (तत्कालीन प्रधान लिपिक, नगर परिषद, डेहरी ऑन सोन) को दी गई सजा केवल एक व्यक्ति को मिली सजा नहीं है, बल्कि उन तमाम भ्रष्ट अधिकारियों के लिए एक कड़ा संदेश है जो फाइल आगे बढ़ाने के बदले रिश्वत को अपना हक समझते हैं।
: क्या था पूरा विवाद?
यह मामला साल 2007 का है, जब नगर परिषद के ही एक कर-संग्राहक (Tax Collector) सुधीर कुमार रावत से उनके काम के बदले ₹3500 की रिश्वत मांगी गई थी। भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी थीं, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक कर्मचारी ने अपने ही सहकर्मी को प्रताड़ित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
निगरानी विभाग ने 14 जून 2007 को कार्रवाई करते हुए ₹2900 लेते हुए रंगे हाथों गिरफ्तारी की थी। लगभग 19 साल चले इस लंबे कानूनी सफर के बाद आखिरकार न्याय की जीत हुई।
न्यायालय का फैसला: कानून का डंडा
माननीय न्यायाधीश श्री मो० रुस्तम ने इस मामले में कठोर रुख अपनाते हुए भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (PC Act 1988) के तहत सजा सुनाई:
सजा: आरोपी को विभिन्न धाराओं में 2 से 3 साल तक के सश्रम कारावास की सजा मिली।
अर्थदंड: कुल ₹40,000 का जुर्माना लगाया गया, जिसे न भरने पर अतिरिक्त जेल काटनी होगी।
व्यवस्था में सुधार की दरकार:
भले ही इस फैसले को आने में 19 साल लग गए, लेकिन यह उन ईमानदार अधिकारियों और शिकायतकर्ताओं के हौसले को बढ़ाता है जो सिस्टम से लड़ने का साहस रखते हैं।
निगरानी ब्यूरो के अनुसंधानकर्ता परमानन्द सिंह और विशेष लोक अभियोजक किशोर कुमार सिंह की प्रभावी पैरवी का परिणाम है कि आज एक भ्रष्ट लोक सेवक अपने अंजाम तक पहुँचा।
बिहार जैसे राज्य में, जहाँ विकास की गति को अक्सर भ्रष्टाचार का दीमक चाट जाता है, वहां इस तरह के फैसले प्रशासनिक शुचिता बनाए रखने के लिए बेहद जरूरी हैं।
प्रशासन को चाहिए कि वह ऐसी प्रक्रियाओं को और सरल बनाए ताकि कोई भी अधिकारी किसी आम नागरिक या कर्मचारी का शोषण न कर सके।
निष्कर्ष: न्याय में देरी न्याय न मिलने के बराबर कही जाती है, लेकिन जब फैसला आता है, तो वह समाज में विश्वास बहाल करता है। कृष्णदेव पासवान का यह मामला हर उस सरकारी बाबू के लिए चेतावनी है, जो जनता की सेवा के बजाय अपनी तिजोरी भरने में विश्वास रखते हैं।