छठ के विहान की अनुपम छटा: कविता के जरिए विशाल गुप्ता 'करुण' ने उकेरा लोक आस्था का महापर्व।
इस कविता के माध्यम से कवि विशाल गुप्ता 'करुण' ने छठ महापर्व की सुबह (विहान) के उस दृश्य को उकेरा है, जहाँ भक्ति और व्यस्तता एक साथ चलती है। कवि बताते हैं कि कैसे घर का छोटा बच्चा खेल-कूद में हाथ बँटा रहा है, तो बुजुर्गों में भी त्योहार के कारण नई ऊर्जा आ गई है।
कविता में घाटों की साफ-सफाई, ठेकुआ बनाने की तैयारी, डाला और सूप धोने की परंपरा और घाट पर गूंजते लोकगीतों का सजीव चित्रण है। संक्षेप में कहें तो, यह कविता दिखाती है कि कैसे यह पर्व पूरे गाँव और समाज को एक सूत्र में पिरो देता है और 'अरघ' (Arghya) के समय का इंतज़ार हर दिल में एक अलग ही उमंग भर देता है।