₹ का निकला दम! डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर के करीब पहुंचा रुपया, आर्थिक प्रबंधन पर उठे सवाल
नई दिल्ली, वैश्विक अनिश्चितताओं और विदेशी निवेश की निकासी के बीच भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले ऐतिहासिक रूप से कमजोर स्तर के करीब पहुंच गया है। बुधवार को अंतरबैंक विदेशी मुद्रा विनिमय बाजार (Interbank Forex Market) में शुरुआती कारोबार के दौरान रुपया लगभग 93.94–93.96 प्रति डॉलर के स्तर तक गिर गया। यह भारतीय मुद्रा के लिए अब तक के सबसे कमजोर स्तरों में गिना जा रहा है।
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) में जारी तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में अस्थिरता, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की बिकवाली और डॉलर की वैश्विक मजबूती ने रुपये पर दबाव बढ़ा दिया है। हालांकि घरेलू शेयर बाजार में मजबूती देखने को मिली, लेकिन इससे रुपये की गिरावट पर अधिक असर नहीं पड़ा।
गिरावट के प्रमुख कारण:
अर्थशास्त्रियों और विदेशी मुद्रा कारोबारियों के अनुसार रुपये में कमजोरी के पीछे कई प्रमुख कारण जिम्मेदार हैं:
1. मिडिल ईस्ट तनाव और तेल आयात पर दबाव-
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। भू-राजनीतिक तनाव बढ़ने से कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव की आशंका बढ़ जाती है, जिससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर होता है।
2. विदेशी निवेशकों की निकासी-
हाल के दिनों में विदेशी निवेशकों द्वारा भारतीय बाजारों से पूंजी निकालने के संकेत मिले हैं। इससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपये पर दबाव पड़ता है।
3. वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता-
अंतरराष्ट्रीय आर्थिक हालात, ब्याज दरों से जुड़ी नीतियां और सुरक्षित निवेश के रूप में डॉलर की मांग बढ़ने से उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राएं कमजोर होती हैं।
4. आयात महंगा होने का असर-
रुपये की कमजोरी से पेट्रोलियम, इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी और अन्य आयातित वस्तुएं महंगी हो सकती हैं, जिससे महंगाई बढ़ने का खतरा रहता है।
सरकार और नीतिगत प्रबंधन पर आलोचनात्मक दृष्टि:
विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक परिस्थितियां रुपये की गिरावट का प्रमुख कारण हैं, लेकिन आर्थिक प्रबंधन को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
आलोचकों का कहना है कि:
•ऊर्जा आयात पर अत्यधिक निर्भरता रुपये को बाहरी झटकों के प्रति संवेदनशील बनाती है।
•विदेशी निवेश को स्थिर बनाए रखने के लिए स्पष्ट और भरोसेमंद नीतिगत संकेत जरूरी हैं।
•निर्यात को बढ़ावा देने और डॉलर आय बढ़ाने के लिए दीर्घकालिक रणनीति की आवश्यकता है।
•मुद्रा स्थिरता बनाए रखने में केंद्रीय बैंक की सीमित हस्तक्षेप क्षमता भी चिंता का विषय बनी हुई है।
आम जनता पर प्रभाव:
•रुपये की कमजोरी का असर सीधे आम नागरिकों पर पड़ सकता है:
•पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी की संभावना
•आयातित वस्तुओं के महंगे होने से महंगाई का दबाव
•विदेश यात्रा और विदेशी शिक्षा महंगी
•उद्योगों की लागत बढ़ने से उपभोक्ता कीमतों में वृद्धि
कमजोर रुपया आर्थिक वृद्धि दर (GDP Growth) पर भी असर डाल सकता है, क्योंकि बढ़ती महंगाई से उपभोग और निवेश प्रभावित होते हैं।
वैश्विक संकट और घरेलू आर्थिक चुनौतियों के बीच रुपये की गिरावट नीति निर्माताओं के लिए एक बड़ी परीक्षा बनती जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि मजबूत आर्थिक रणनीति, निर्यात प्रोत्साहन, विदेशी निवेश आकर्षित करने की नीति और ऊर्जा आत्मनिर्भरता पर ध्यान देकर ही रुपये को स्थिरता दी जा सकती है।
यदि गिरावट का सिलसिला जारी रहा, तो आने वाले समय में महंगाई और आर्थिक विकास पर दबाव बढ़ सकता है, जिससे सरकार की आर्थिक नीतियों की प्रभावशीलता पर बहस तेज होना तय है।