2026 का वैश्विक महासंकट: भारत के लिए चुनौतियाँ और "शांतिदूत" की भूमिका ।
"क्षमा शोभाति उस भुजंग को जिसके पास गरल हो,उसका क्या जो दंतहीन,विषरहित,विनीत,सरल हो"
-रामधारी सिंह दिनकर
वर्तमान में पश्चिम एशिया (Middle East) में अमेरिका-इज़राइल और ईरान के बीच छिड़ा यह भीषण संघर्ष केवल एक क्षेत्रीय युद्ध नहीं, बल्कि एक वैश्विक आर्थिक और मानवीय सुनामी है। 28 फरवरी 2026 से शुरू हुए इन हमलों ने दुनिया को एक ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहाँ एक तरफ आधुनिक तकनीक से लैस विनाश है, तो दूसरी तरफ मानवता के अस्तित्व का संकट।
भारत की कूटनीतिक संतुलन शुरू से ही बेमिसाल रही है बुद्ध की धरती से शांति का आह्वान
भारत हमेशा से "वसुधैव कुटुंबकम" के सिद्धांत पर चला है। भगवान बुद्ध और महावीर की यह धरती युद्ध का समाधान शस्त्रों में नहीं, बल्कि संवाद में देखती है।
भारत के संबंध इज़राइल के साथ रक्षा और तकनीक में गहरे हैं, तो ईरान के साथ "चाबहार पोर्ट" और ऊर्जा सुरक्षा के माध्यम से ऐतिहासिक जुड़ाव है।
भारत इस समय गुटनिरपेक्षता से आगे बढ़कर एक "विश्व मित्र" के रूप में दोनों पक्षों को बातचीत की मेज पर लाने का सामर्थ्य रखता है।
तेल की तपिश और आपूर्ति श्रृंखला
ईरान द्वारा "होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz)" को बाधित करने की चेतावनी भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता है।
भारत अपनी जरूरत का 80% से अधिक कच्चा तेल आयात करता है। आपूर्ति रुकने से घरेलू स्तर पर पेट्रोल-डीजल की कीमतें आसमान छू सकती हैं, जिसका सीधा असर परिवहन और खाद्य वस्तुओं की कीमतों (महंगाई) पर पड़ेगा।
खाड़ी देशों में रहने वाले लाखों भारतीयों की सुरक्षा और वहां से आने वाला 'रेमिटेंस' (विदेशी मुद्रा) इस युद्ध की भेंट चढ़ सकता है।
हमें घरेलू मोर्चा पे पैनिक बाइंग से बचना चाहिए युद्ध की स्थिति में सबसे बड़ा दुश्मन 'डर' और 'अफवाह' होती है।
कोरोना काल के अनुभवों से सीखते हुए, भारतीय नागरिकों को गैस, पेट्रोल और राशन जैसी आवश्यक वस्तुओं को अनावश्यक रूप से स्टोर करने से बचना चाहिए।
संचय करने की प्रवृत्ति समाज के गरीब और जरूरतमंद तबके को संकट में डालती है, जो अंततः आंतरिक असंतोष और गृह युद्ध जैसी स्थितियों को जन्म दे सकती है।
सरकार को इस भीषण परिस्थिति में अपने नीतियां बनाते वक्त कुछ बातों का ध्यान रखने की जरूरत है जैसे
इस संकट काल में सरकार की नीतियां 'वोट बैंक' के बजाय 'राष्ट्र निर्माण' पर केंद्रित होनी चाहिए:
मुफ्त योजनाओं के बजाय संसाधनों को केवल उन लोगों तक पहुँचाया जाए जो वास्तव में विपन्न हैं।
सरकार को अपने रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार का कुशलता से प्रबंधन करना होगा ताकि कम से कम अल्पकालिक आपूर्ति सुनिश्चित रहे।
जमाखोरी करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई और कीमतों को नियंत्रित करने के लिए आपातकालीन आर्थिक ढांचे की आवश्यकता है।
युद्ध हमेशा विनाश लाता है, चाहे वह सीमाओं पर हो या वैश्विक अर्थव्यवस्था में। भारत को इस समय अपनी सैन्य शक्ति से ज्यादा अपनी 'सॉफ्ट पावर' और 'आंतरिक एकता' की आवश्यकता है। अगर हम संयम बरतते हैं और सरकार ठोस, निष्पक्ष निर्णय लेती है, तो हम न केवल इस संकट से उबरेंगे, बल्कि विश्व को शांति का मार्ग भी दिखाएंगे।
मनीष सिंह
शाहपुर पटोरी
@ManishSingh_PT