विद्रूप का चक्रव्यूह: आरक्षण की छाया में मेरिट का हनन...
▪️भारतवर्ष की आत्मा आज दो टुकड़ों में बँटी हुई है। एक ओर वह राष्ट्र है जो सरहदों पर खून बहाकर जीवित रहता है, दूसरी ओर वह समाज है जो भीतर ही भीतर मर रहा है। दोनों जगह एक ही प्राणी है—मानव। फिर क्यों एक ही प्राणी के लिए दो अलग-अलग न्याय? क्यों सरहद पर तो मेरिट का सूर्य चमकता है और भीतर आरक्षण की अंधेरी रात?
▪️संविधान के निर्माताओं ने अनुच्छेद ३३४ में आरक्षण को मात्र दस वर्ष की कृपापात्र अवधि दी थी। वे समझते थे कि यह अस्थायी औषधि है, स्थायी विष नहीं। किन्तु वोट की राजनीति ने इस औषधि को अमृत बना दिया। हर दस वर्ष बाद संशोधन, हर संशोधन के साथ नया कोटा, नया विस्तार। आज यूजीसी से लेकर नेशनल कमीशन तक, हर संस्था में वही पुराना गीत गूँजता है—आरक्षण, आरक्षण, आरक्षण। विशेष हॉस्टल, विशेष पैकेज, विशेष अलर्ट, विशेष स्कॉलरशिप। और फिर भी योग्यता शून्य। फिर भी नियुक्ति। फिर भी पद।
▪️दूसरी ओर जनरल वर्ग का वह युवक, जो ९०% नब्बे प्रतिशत से ऊपर अंक लाकर भी पूरा शुल्क देता है। गरीब हो तो भी कोई राहत नहीं। कोई हॉस्टल नहीं। कोई स्कॉलरशिप नहीं। कोई आयोग नहीं। वह तो केवल मेरिट का बोझ ढोता है। जब वही युवक सरहद पर जाता है, तो अचानक मेरिट की माँग हो जाती है। “-४० अंकों वाले चमत्कार” को प्रधानमंत्री की सुरक्षा में भेजा जाना चाहिए , किन्तु मोर्चे पर तो वही जनरल कैटेगरी का सैनिक अपना सीना तानकर खड़ा हो। यह कैसा न्याय है? यह कैसा विडंबन है?
▪️मानव तो एक ही है। रक्त तो एक ही रंग का है। फिर क्यों भीतर आरक्षण और बाहर मेरिट? क्यों एक ही देश में दो नीतियाँ? क्या यह राजनीतिज्ञों की वोट-बैंक की भूख नहीं कि वे संविधान की मूल भावना को रौंदते चले जा रहे हैं? क्या यह उसी मानसिकता का परिणाम नहीं कि आरक्षण को कभी समाप्त नहीं किया जाएगा, क्योंकि इससे वोट मिलते हैं?
▪️आज स्थिति यह है कि यूजीसी के माध्यम से भेदभाव और गहरा होता जा रहा है। एक वर्ग को सब कुछ मुफ्त, दूसरा वर्ग सब कुछ महँगा। एक वर्ग को पद, दूसरा वर्ग को केवल निराशा। यदि यही सिलसिला चलता रहा तो फिर सवर्णों के लिए अलग विश्वविद्यालय, अलग अस्पताल, अलग रेस्तराँ, अलग बस, अलग ट्रेन—सब कुछ अलग-अलग क्यों न कर दिया जाए? यदि सामाजिक न्याय का नाम लेकर एक वर्ग को सारी सुविधाएँ दी जा सकती हैं, तो दूसरे वर्ग को भी अपनी गरिमा के साथ जीने का अधिकार क्यों नहीं?
▪️यह माँग नहीं, यह तीखा व्यंग्य है। यह चेतावनी है कि यदि मेरिट को लगातार कुचला जाएगा, तो एक दिन राष्ट्र की रीढ़ ही टूट जाएगी। सेना में मेरिट इसलिए जरूरी है क्योंकि वहाँ दुश्मन गोली चलाता है, न कि आरक्षण का सर्टिफिकेट। यदि वही नीति देश के भीतर लागू हो तो फिर दुश्मन की जरूरत ही क्या? हम स्वयं ही एक-दूसरे को कमजोर करते चले जाएँगे।
▪️समय आ गया है कि हम पूछें—क्या राष्ट्र की रक्षा केवल जनरल कैटेगरी के कंधों पर ही होनी चाहिए? क्या सामाजिक न्याय का अर्थ केवल वोट-बैंक तक सीमित है? क्या संविधान में आरक्षण केवल दस वर्ष के लिए था या अनंत काल के लिए?
▪️जब तक हम इस दोहरी नीति को नहीं तोड़ेंगे, तब तक हमारा राष्ट्र सशक्त नहीं हो सकता। मेरिट को सर्वोपरि मानना ही एकमात्र मार्ग है—चाहे वह सरहद हो या सिविल सेवा, चाहे वह अस्पताल हो या विश्वविद्यालय। अन्यथा इतिहास हमें केवल एक नाम से याद रखेगा—“वोट की राजनीति में मेरिट का शव”।
✍️“मेरी कलम से – ब्रजेश कुमार त्रिवेदी”