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बिहार में राजनीति की वेदी पर बलि चढ़ती बेटियां: न्याय का "जातिगत" मौन ।

जब किसी नाबालिक मासूम की चीख (सारण में) कुएं की गहराइयों में दफन हो जाती है या किसी (नीट) छात्रा के सपने पटना की सड़कों पर दम तोड़ देते हैं, तब केवल एक शरीर नहीं मरता, बल्कि उस राष्ट्र का विश्वास मरता है जो खुद को "लोकतंत्र की जननी" कहता है। बिहार के सारण से लेकर राजधानी पटना तक की ये घटनाएं रूह कंपा देने वाली हैं, लेकिन उससे भी ज्यादा डरावनी है सत्ता और विपक्ष की "चुप्पी" ।

"न्याय की तराजू जब जाति तौलने लगे, तो समझो इंसानियत हार गई...
मासूम की चीख का कोई गोत्र नहीं होता, और बहते लहू का कोई रंग नहीं होता।"

क्या न्याय अब जाति देखकर तय होगा ?

यह एक कड़वा और नग्न सत्य है कि आज के दौर में न्याय की गति इस बात पर निर्भर करने लगी है कि पीड़िता किस समाज से आती है। यदि पीड़ित किसी ऐसे वर्ग से है जो "वोट बैंक" के समीकरण में फिट नहीं बैठता, तो प्रशासन के जूते ढीले पड़ जाते हैं और नेताओं की जुबान सिल जाती है।

चाहे वह सवर्ण समाज की बेटियां हों या कोई और, अगर उनकी मौत से किसी का राजनीतिक एजेंडा नहीं सधता, तो उनके लिए न मोमबत्तियां जलती हैं, न ही बड़े आंदोलन होते हैं।

जब मुख्यमंत्री की नाक के नीचे अपराध हो और तंत्र सोया रहे, तो यह स्पष्ट है कि प्राथमिकता 'सुरक्षा' नहीं बल्कि "कुर्सी का गणित" है।

क्या "बेटी बचाओ" का नारा या महज चुनावी जुमला है ?

केंद्र से लेकर राज्य तक, जो ऊंचे स्वर में बेटियों के संरक्षण की कसमें खाई जाती हैं, वे हकीकत की जमीन पर लहूलुहान नजर आती हैं। जब चुनाव आते हैं, तो बेटियां "शक्ति" का प्रतीक बन जाती हैं, लेकिन जब वही बेटियां दरिंदगी का शिकार होती हैं, तो तंत्र "जाति कार्ड" खेलने लगता है।

"अन्याय की कोई जाति नहीं होती और अपराधी का कोई धर्म नहीं होता, लेकिन जब रक्षक ही जाति के चश्मे से अपराध देखने लगें, तो समझ लीजिए कि लोकतंत्र आईसीयू (ICU) में है।"


एक ओर देश जाति और धर्म की आग में झुलस रहा है, दूसरी ओर बुनियादी मुद्दों से ध्यान भटकाकर समाज की दरारों को और गहरा किया जा रहा है। क्या देश के पास अब रोजगार, सुरक्षा और न्याय जैसे बुनियादी मुद्दे खत्म हो गए हैं?

पहले धर्म के नाम पर ध्रुवीकरण और अब जाति के नाम पर समाज का बंटवारा—यह सत्ता की भूख का वह स्तर है जहां मासूमों की लाशें भी सिर्फ एक "आंकड़ा" बनकर रह गई हैं। लोकतंत्र की खूबसूरती 'मजबूत विपक्ष' में होती है, लेकिन जब विपक्ष भी चुनावी नफे-नुकसान को देखकर अपनी जुबान खोले, तो आम आदमी अपनी गुहार लेकर जाए तो कहां जाए?

सारण की उस बच्ची की रूह आज न्याय मांग रही है। वह नहीं जानती थी कि वह 'सवर्ण' है या 'पिछड़ी', वह बस जीना चाहती थी। यदि हम आज भी चुप रहे, तो इतिहास हमें एक ऐसे बुजदिल समाज के रूप में याद रखेगा जिसने अपनी बेटियों की सुरक्षा से ज्यादा अपनी जातिगत श्रेष्ठता और राजनीतिक निष्ठा को महत्व दिया।

सत्ता में बैठे लोगों को जागना होगा, वरना याद रखिए—इतिहास के पन्ने जब पलटे जाएंगे, तो आपकी यह "चुप्पी" सबसे बड़ा अपराध मानी जाएगी।

मनीष सिंह
शाहपुर पटोरी
@ManishSingh_PT

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