चैत्र कृष्णा नवमी , सनातन के पितामह आदिनाथ तीर्थंकर ऋषभदेव के जन्म कल्याणक की हार्दिक शुभकामनाएं
भगवान ऋषभदेव केवल जैन धर्म के ही नहीं, बल्कि मानवता के इतिहास में सभ्यता और संस्कृति के आधार स्तंभ माने जाते हैं। उनके विस्तार और महिमा को हम कुछ प्रमुख बिंदुओं के माध्यम से समझ सकते हैं:
1. युग प्रवर्तक और प्रथम तीर्थंकर
इस अवसर्पिणी काल (समय चक्र) में भगवान ऋषभदेव प्रथम तीर्थंकर हुए। उन्होंने ही समाज को असभ्यता से सभ्यता की ओर मोड़ा। जब कल्पवृक्षों का प्रभाव समाप्त होने लगा और लोगों को जीवन यापन में कठिनाई होने लगी, तब उन्होंने मानवता को जीवित रहने की कला सिखाई।
2. 'असि, मसि और कृषि' के जनक
भगवान आदिनाथ ने संसार को सुव्यवस्थित ढंग से चलाने के लिए षट्कर्मों (छह कलाओं) का उपदेश दिया:
असि: आत्मरक्षा और न्याय के लिए शस्त्र संचालन।
मसि: लेखन कला और विद्या।
कृषि: खेती और अन्न उगाना।
विद्या: विभिन्न प्रकार के शिल्प और ज्ञान।
शिल्प: घर बनाना और निर्माण कला।
वाणिज्य: व्यापार और अर्थव्यवस्था।
3. इक्ष्वाकु वंश के संस्थापक और प्रथम राजा
अयोध्या के राजा नाभिराय और माता मरुदेवी के पुत्र के रूप में उन्होंने जन्म लिया। वे इक्ष्वाकु वंश के प्रथम राजा बने। उन्होंने ही पहली बार राज व्यवस्था, दंड नीति और समाज के नियम बनाए, इसीलिए उन्हें 'राजाधिराज' और 'आदि पुरुष' कहा जाता है।
4. महान त्यागी और मोक्ष मार्ग के नेता
राजपाट का त्याग कर उन्होंने दीक्षा ली और हजारों वर्षों तक घोर तपस्या की। उन्हें कैवल्य ज्ञान (पूर्ण ज्ञान) प्राप्त हुआ। उन्होंने सत्य, अहिंसा और अपरिग्रह का मार्ग दिखाया। उनके प्रथम शिष्य (गणधर) वृषभसेन थे और उनके ज्येष्ठ पुत्र भरत चक्रवर्ती के नाम पर ही इस देश का नाम 'भारत' पड़ा।
5. सर्वमान्य अस्तित्व
भगवान ऋषभदेव की महिमा केवल जैन ग्रंथों तक सीमित नहीं है:
श्रीमद्भागवत पुराण में उन्हें विष्णु के 24 अवतारों में से आठवां अवतार माना गया है।
ऋग्वेद जैसे प्राचीन वेदों में भी 'ऋषभ' नाम का सादर उल्लेख मिलता है।
"नाभिराज-मरुदेवी के नंदन, युग के आदि विधाता।
धर्म-तीर्थ के प्रथम प्रवर्तक, जग के सुख-दुख ज्ञाता॥"
भगवान आदिनाथ का जीवन हमें सिखाता है कि कैसे एक कुशल शासक होने के साथ-साथ एक महान आध्यात्मिक योगी बना जा सकता है।