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GST का घटा बोझ, पर जेब अभी भी खाली: आम ग्राहक और छोटे दुकानदार के साथ बड़ा धोखा?

" टैक्स के स्लैब तो कम हो गए , पर नैतिकता का स्लैब गिरना अभी बाकी है"


भारत में जब GST (वस्तु एवं सेवा कर) लागू किया गया, तो सरकार का मुख्य तर्क था—"एक राष्ट्र, एक कर" और उपभोक्ता को महंगाई से राहत।

सरकार ने समय-समय पर कई दैनिक उपयोग की वस्तुओं पर कर की दरों (GST Slabs) को 28% से 18% और 18% से 12% और 12% से 5% तक घटाया। लेकिन विडंबना यह है कि कर घटने के महीनों बाद भी आम आदमी की थाली और घर का सामान सस्ता नहीं हुआ।

जैसे ही सरकार किसी उत्पाद पर GST कम करने की घोषणा करती है, बड़ी मैन्युफैक्चरिंग कंपनियां तुरंत अपने उत्पाद की 'बेस प्राइस' (मूल कीमत) बढ़ा देती हैं।
उदाहरण के लिए यदि ₹100 के सामान पर पहले 18% GST था, तो वह ₹118 का मिलता था। सरकार ने टैक्स घटाकर 12% किया, तो कीमत ₹112 होनी चाहिए थी। लेकिन कंपनियों ने बेस प्राइस ₹100 से बढ़ाकर ₹106 कर दी, जिससे सामान फिर से ₹118 का ही रहा।
नतीजा सरकार का टैक्स कम हुआ, लेकिन ग्राहक को कोई फायदा नहीं मिला। वह सारा पैसा कंपनियों के मुनाफे में जुड़ गया।


सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि GST लागू होने के बाद आज भी भारत में 'मैक्सिमम रिटेल प्राइस' (MRP) तय करने का कोई ठोस और पारदर्शी नियम नहीं है। कंपनियां अपनी लागत से कहीं ज्यादा MRP प्रिंट करती हैं।

पैकेजिंग पर प्राइस टैगिंग पूरी तरह कंपनियों के नियंत्रण में है। सरकार की तरफ से अभी तक ऐसा कोई 'प्राइस रेगुलेटरी स्ट्रक्चर' तैयार नहीं किया गया है जो यह जांच सके कि टैक्स घटने के बाद कंपनियों ने वास्तव में अपनी कीमतें कम की हैं या नहीं।

इसका सीधा नुकसान छोटे दुकानदारों को होता है, क्योंकि उन्हें प्रिंट रेट पर ही सामान बेचना पड़ता है, जबकि बड़ी ई-कॉमर्स कंपनियां भारी छूट का दिखावा कर ग्राहकों को अपनी ओर खींच लेती हैं।

GST आने के बाद एक नया समस्या जन्म लिया है 'फुल बिल' बनाम 'हाफ बिल' का ओल - झोल ।

बाजार में एक नई समानांतर अर्थव्यवस्था चल रही है। बड़ी ब्रांडेड कंपनियां 'फुल बिल' (पक्का बिल) पर काम करती हैं, लेकिन कई मध्यम और साधारण कंपनियां 'हाफ बिल' (कच्चा बिल) का सहारा लेती हैं।

इस दोहरी बिलिंग प्रणाली के कारण बाजार में एक ही गुणवत्ता के सामान की अलग-अलग कीमतें होती हैं, जिससे आम ग्राहक भ्रमित रहता है।

छोटे दुकानदार जो ईमानदारी से काम करना चाहते हैं, वे इस 'हाफ बिल' और टैक्स चोरी के चक्कर में प्रतिस्पर्धा से बाहर हो रहे हैं।

अब एक सवाल ये उठता है कि क्या GST सिर्फ सरकार के फायदे के लिए है?

आज आम ग्राहक के मन में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या GST का लाभ केवल सरकारी खजाना भरने और बड़े कॉर्पोरेट घरानों को फायदा पहुँचाने के लिए है?

तेल, लॉजिस्टिक्स और कच्चे माल की बढ़ती कीमतों के नाम पर कंपनियां रेट बढ़ा देती हैं, लेकिन टैक्स कम होने पर कीमतें नहीं घटातीं।

सरकार के पास 'एंटी-प्रॉफिटियरिंग' (मुनाफाखोरी विरोधी) कानून तो हैं, लेकिन उनका कार्यान्वयन इतना ढीला है कि आम जनता तक राहत पहुँचते-पहुँचते दम तोड़ देती है।
सुधार का असली पैमाना सरकारी खजाना नहीं, बल्कि वह राहत है जो एक आम आदमी को काउंटर पर पैसे चुकाते समय महसूस होनी चाहिए।"

जब तक सरकार MRP तय करने के लिए एक सख्त नीति और मूल्य निगरानी तंत्र (Price Monitoring System) नहीं बनाती, तब तक GST दरों को कम करने का लाभ केवल कागजों तक ही सीमित रहेगा। आम ग्राहक को महंगाई की मार से बचाने के लिए कंपनियों की 'प्राइस टैगिंग मोनोपोली' को खत्म करना और छोटे दुकानदारों को एक समान धरातल (Level Playing Field) प्रदान करना अनिवार्य है।

"जब टैक्स का लाभ ग्राहक की जेब तक न पहुँचे, तो वह सुधार नहीं, सिर्फ मुनाफे का नया नाम बन जाता है।"

मनीष सिंह
शाहपुर पटोरी
@ManishSingh_PT

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