logo
Select Language
Hindi
Bengali
Tamil
Telugu
Marathi
Gujarati
Kannada
Malayalam
Punjabi
Urdu
Oriya

भारत में इच्छामृत्यु से जुड़े एक अहम मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में भावुक पल देखने को मिला.

बुधवार को जस्टिस जे बी पारदीवाला फैसला सुनाते समय भावुक हो गए और उनकी आंखों में आंसू आ गए. यह मामला 32 वर्षीय हरीश राणा से जुड़ा है, जो पिछले 13 सालों से कोमा जैसी स्थिति यानी पर्सिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट में हैं. सुप्रीम कोर्ट की बेंच में जस्टिस पारदीवाला के साथ जस्टिस के. वी. विश्वनाथन भी शामिल थे.

13 साल से कोमा में हैं हरीश राणा:

अदालत को बताया गया कि हरीश राणा करीब 13 साल पहले एक दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो गए थे. उसके बाद से वह लगातार पर्सिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट में हैं. कोर्ट ने कहा, कि हरीश में केवल सोने-जागने का चक्र दिखाई देता है, लेकिन वह किसी तरह की प्रतिक्रिया या बातचीत करने में सक्षम नहीं हैं. वह अपने सभी दैनिक कामों के लिए पूरी तरह दूसरों पर निर्भर हैं. उनका पोषण भी एक मेडिकल ट्यूब (PEG ट्यूब) के जरिए दिया जा रहा है और इतने वर्षों में उनकी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है.

कोर्ट ने दी पैसिव इच्छामृत्यु की अनुमति:

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि अगर मेडिकल बोर्ड यह मानता है कि मरीज के ठीक होने की कोई संभावना नहीं है, तो जीवन बनाए रखने वाले इलाज को हटाने की अनुमति दी जा सकती है. कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मेडिकल तरीके से दिया जाने वाला पोषण भी एक तरह का इलाज ही माना जाता है और जरूरत पड़ने पर इसे भी बंद किया जा सकता है. यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के पहले दिए गए ऐतिहासिक निर्णय कॉमन कॉज़ बनाम यूनियन ऑफ इंडिया के दिशा-निर्देशों के अनुसार लिया गया है.

फैसला सुनाते समय भावुक हुए जज:

फैसला पढ़ते समय जस्टिस पारदीवाला ने कहा कि हरीश राणा कभी एक उज्ज्वल छात्र थे और अपने भविष्य के सपने देख रहे थे. लेकिन हादसे के बाद उनकी जिंदगी पूरी तरह बदल गई. मामले की परिस्थितियों का जिक्र करते-करते जस्टिस पारदीवाला भावुक हो गए और कुछ देर के लिए उनकी आंखें नम हो गईं.

0
0 views

Comment