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स्मार्ट टीवी बनाम DTH: मनोरंजन की स्वायत्तता या "डिजिटल जाल" की ओर बढ़ते कदम?

आज के हाई-स्पीड इंटरनेट और स्मार्ट टीवी के दौर ने मनोरंजन की परिभाषा को पूरी तरह बदल दिया है।
एक ओर जहाँ यह "सुविधा" और "अनंत विकल्पों" का मायाजाल बुनता है, वहीं दूसरी ओर इसके पीछे छिपे आर्थिक और सामाजिक जोखिमों को नजरअंदाज करना आत्मघाती हो सकता है। विशेष रूप से भारत जैसे देश में, जहाँ टेलीविजन केवल एक उपकरण नहीं, बल्कि मध्यम वर्ग की दिनभर की मानसिक थकान मिटाने का सबसे सुलभ और सस्ता सहारा है।


स्मार्ट टीवी के माध्यम से YouTube, Netflix और Prime जैसे ऐप्स ने कंटेंट की बाढ़ ला दी है। उपभोक्ता को भ्रम है कि वह "स्वतंत्र" है, लेकिन यह स्वतंत्रता "इंटरनेट की अनिवार्य निर्भरता" की बेड़ियों के साथ आती है।

90 के दशक का वह दौर याद कीजिए, जब पूरा परिवार एक साथ बैठकर 'रामायण' या 'महाभारत' जैसे कालजयी धारावाहिक देखता था। वे कार्यक्रम केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि नई पीढ़ी के लिए संस्कारों की पाठशाला थे।

आज की स्मार्ट तकनीक ने हमें "निजी स्क्रीन" (Personal Screen) तो दे दी, लेकिन वह सामूहिक पारिवारिक अनुभव और संस्कारों की जीवंतता छीन ली है।

मध्यम वर्ग अपनी सीमित आय का एक बहुत छोटा हिस्सा मनोरंजन पर खर्च करता है। इस गणित को समझना जरूरी है:
जहां एक निश्चित मासिक रिचार्ज में पूरे परिवार के लिए समाचार, खेल और मनोरंजन उपलब्ध होता है।

वही दूसरी और आपको महंगे स्मार्ट टीवी के साथ-साथ हाई-स्पीड ब्रॉडबैंड का बिल भरना होता है, और फिर हर OTT प्लेटफॉर्म का अलग-अलग सब्सक्रिप्शन।

जैसे-जैसे लोग इस मॉडल की ओर बढ़ेंगे, पारंपरिक DTH सेवा प्रदाता अपना कारोबार समेट लेंगे। यह ठीक वैसा ही होगा जैसा FM रेडियो के आने से पारंपरिक रेडियो के साथ हुआ। जब विकल्प खत्म हो जाएंगे, तब मुट्ठी भर इंटरनेट प्रदाता कंपनियाँ अपनी "मनॉपली (एकाधिकार)" स्थापित कर मनचाहे दाम वसूलेंगी।

एक वक्त था जब रेडियो के दौर में एक 'RJ' होता था जो श्रोताओं की भावनाओं और समय की नब्ज पहचानकर गाने या समाचार प्रसारित करता था—उसमें एक मानवीय जुड़ाव (Human Touch) था।

इसके विपरीत, स्मार्ट टीवी और OTT पूरी तरह "एल्गोरिदम" पर आधारित हैं। यह तकनीक आपको वही दिखाती है जो आप देखना चाहते हैं, जिससे आपकी सोच का दायरा संकुचित हो जाता है। DTH पर प्रसारित समाचार और कार्यक्रम एक साझा सामाजिक विमर्श पैदा करते थे, जो अब व्यक्तिगत पसंद के बंद कमरों में कैद हो गया है।


पारंपरिक माध्यमों को धीरे-धीरे हाशिए पर धकेलना एक बड़े वैश्विक बाजार तंत्र की रणनीति का हिस्सा प्रतीत होता है। जब पूरा समाज मनोरंजन के लिए केवल इंटरनेट पर निर्भर हो जाएगा, तब डेटा की कीमतें और सूचनाओं का नियंत्रण चंद बड़ी कंपनियों के हाथ में होगा। बुजुर्गों के लिए यह जटिल तकनीक एक "डिजिटल बाधा" बन चुकी है, जो उन्हें समाज की मुख्यधारा की सूचनाओं से काट रही है।

"तकनीक का स्वागत उन्नति के लिए होना चाहिए, गुलामी के लिए नहीं।"

मनोरंजन का लोकतंत्रीकरण तभी सुरक्षित रह सकता है जब DTH जैसा सस्ता और सुलभ माध्यम जीवित रहे। यदि हम पूरी तरह इंटरनेट के अधीन हो गए, तो भविष्य में मनोरंजन "आम आदमी का अधिकार" नहीं, बल्कि अमीरों का विलासिता पूर्ण सौदा बनकर रह जाएगा। सरकार और समाज को यह सुनिश्चित करना होगा कि डिजिटल क्रांति के नाम पर मध्यम वर्ग से उसका सुकून और सस्ता मनोरंजन न छीना जाए।

मनीष सिंह
शाहपुर पटोरी
@ManishSingh_PT

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