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चीता प्रोजेक्ट में बारां जिले को शामिल करने की मांग, प्रधानमंत्री के नाम दिया ज्ञापन

बारां/मांगरोल। चीता पुनर्वास परियोजना के विस्तार को लेकर बारां जिले को भी इसमें शामिल करने की मांग उठी है। इस संबंध में संस्था “हम लोग” के अध्यक्ष डॉ. सुधीर गुप्ता व किसान नेता कुंदन चीता के नेतृत्व में रविवार को मांगरोल एसडीओ को प्रधानमंत्री के नाम एक ज्ञापन दिया।ज्ञापन में मांग करते हुए कहा कि बारां जिले के वन क्षेत्रों को चीता प्रोजेक्ट में शामिल करने का अनुरोध किया है।
पत्र में बताया गया है कि 17 सितंबर 2022 को देश में ऐतिहासिक चीता पुनर्वास परियोजना की शुरुआत हुई थी, जिसके तहत अफ्रीका से लाए गए चीतों को मध्यप्रदेश के कुनो राष्ट्रीय उद्यान में बसाया गया। वर्तमान में चीतों की संख्या बढ़कर लगभग 50 के आसपास पहुंच चुकी है, जो इस परियोजना की सफलता का प्रतीक है।
डॉ. गुप्ता ने अपने पत्र में उल्लेख किया कि कुनो राष्ट्रीय उद्यान से कई चीते निकलकर राजस्थान के बारां जिले के वन क्षेत्रों में लगातार विचरण कर रहे हैं। हाल ही में चीता केपी-2 और केपी-3 रामगढ़ क्रेटर क्षेत्र में देखे गए हैं, जबकि इससे पहले भी कई चीते जिले के अलग-अलग जंगलों में आ चुके हैं।
उन्होंने कहा कि बारां जिला अपनी समृद्ध वन संपदा, विस्तृत घास के मैदान, जल स्रोतों और जैव विविधता के कारण वन्यजीवों के लिए अत्यंत अनुकूल प्राकृतिक आवास प्रदान करता है। विशेष रूप से बांध आमली कंजरवेशन रिजर्व, शेरगढ़ अभयारण्य, शाहाबाद कंजरवेशन रिजर्व और रामगढ़ क्रेटर क्षेत्र चीतों के दीर्घकालिक संरक्षण और प्राकृतिक विचरण के लिए उपयुक्त माने जाते हैं।
पत्र में यह भी कहा गया है कि चीतों का बार-बार इस क्षेत्र में आना और यहां प्राकृतिक रूप से शिकार करना इस बात का संकेत है कि बारां जिले की भौगोलिक और पारिस्थितिक परिस्थितियां चीतों के लिए सुरक्षित और अनुकूल हैं। स्थानीय नागरिकों और पर्यावरण प्रेमियों में भी चीतों को लेकर सकारात्मक माहौल और उत्साह देखा जा रहा है।
डॉ. गुप्ता ने मांग की है कि यदि बारां जिले के वन क्षेत्रों को चीता प्रोजेक्ट के अंतर्गत विकसित किया जाता है, तो इससे न केवल वन्यजीव संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा बल्कि इको-टूरिज्म, स्थानीय रोजगार और क्षेत्रीय विकास को भी नई दिशा मिलेगी।
उन्होंने प्रधानमंत्री से आग्रह किया है कि राजस्थान राज्य को भी चीता प्रोजेक्ट में शामिल करते हुए बारां जिले के जंगलों को चीता पुनर्वास और संरक्षण के संभावित क्षेत्र के रूप में गंभीरता से विचार किया जाए। साथ ही जो चीते बार-बार इस क्षेत्र में आ रहे हैं, उन्हें ट्रेंकुलाइज कर वापस ले जाने के बजाय प्राकृतिक रूप से यहां विचरण करने का अवसर दिया जाए।
इस संबंध में पत्र की प्रतिलिपि राजस्थान के मुख्यमंत्री, केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री और राज्य के वन मंत्री को भी भेजी गई है।

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