जन औषधि बनाम ब्रांडेड दवाएं: स्वास्थ्य सेवा का संघर्ष और नीतिगत चुनौतियां ।
भारत को "दुनिया की फार्मेसी" कहा जाता है, लेकिन विडंबना यह है कि देश की एक बड़ी आबादी आज भी इलाज के दौरान दवाओं के भारी-भरकम खर्च के कारण कर्ज के जाल में फंस जाती है। 8वें जन औषधि दिवस के मौके पर यह विश्लेषण करना आवश्यक है कि प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि परियोजना (PMBJP) की सफलता और ब्रांडेड दवाओं के 'सिंडिकेट' के बीच की असली बाधा क्या है ?
आम जनता में यह धारणा बैठा दी गई है कि "सस्ती दवा मतलब कम असरदार दवा"।
जबकि हकीकत यह है कि जन औषधि की दवाएं "WHO-GMP" मानकों पर निर्मित होती हैं। इनकी शुद्धता की जांच "NABL" प्रमाणित लैब्स में की जाती है। CDSCO और DCGI द्वारा निर्धारित कड़े नियमों के तहत ही इन्हें बाजार में लाया जाता है।
तकनीकी रूप से, जेनेरिक और एथिकल दवाओं के साल्ट (Composition) में कोई अंतर नहीं होता, अंतर केवल उनकी ब्रांडिंग और मार्केटिंग की लागत का होता है।
ब्रांडेड दवाओं की ऊंची कीमत का एक बड़ा हिस्सा "मार्केटिंग और इंसेंटिव" में जाता है। दवा कंपनियां डॉक्टरों को कॉन्फ्रेंस, टूर और अन्य उपहारों के माध्यम से लुभाती हैं। इसके बदले में डॉक्टर पर्चे पर जेनेरिक नाम के बजाय विशिष्ट ब्रांड का नाम लिखते हैं।
दवा दुकानों (रिटेलर्स) को ब्रांडेड दवाओं पर भारी मार्जिन मिलता है, जबकि जन औषधि केंद्रों पर यह सीमित है। इसलिए, निजी दुकानदार जेनेरिक दवाओं को बढ़ावा देने में रुचि नहीं रखते।
यह कहना कि सरकार कुछ नहीं कर रही है, पूरी तरह सही नहीं होगा, लेकिन कदमों की गति धीमी जरूर है। सरकार के सामने कुछ मुख्य चुनौतियां हैं
मुक्त बाजार (Free Market):-भारत एक लोकतांत्रिक और मुक्त बाजार वाली अर्थव्यवस्था है। सरकार किसी निजी कंपनी को दवा बनाने या बेचने से पूरी तरह नहीं रोक सकती, जब तक कि वह नियमों का उल्लंघन न करे। नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) ने हाल ही में डॉक्टरों के लिए जेनेरिक दवाएं लिखना अनिवार्य करने का प्रयास किया था, लेकिन डॉक्टरों के संगठनों के कड़े विरोध के कारण इसे फिलहाल टालना पड़ा । हालांकि सरकारी अस्पतालों में अब पर्चो पर दवाओं के साल्ट (composition) लिखना शुरू कर दिया है बाबजूद अब भी निजी प्रैक्टिस करने वाले डॉक्टर अब भी ब्रांडेड दवाएं ही रिकमेंड करते हैं ।
जेनरिक दवाओं के 18,000+ केंद्र होने के बावजूद, ग्रामीण क्षेत्रों में दवाओं की उपलब्धता अभी भी एक चुनौती है।
दवा उद्योग का लॉबी ग्रुप काफी मजबूत है। चुनावी चंदा, भारी निवेश और रोजगार के कारण कोई भी सरकार इस सेक्टर पर रातों-रात कठोर प्रतिबंध लगाने से बचती है। हालांकि, सरकार ने UCPMP (Uniform Code for Pharmaceutical Marketing Practices) लागू किया है, जो कंपनियों द्वारा डॉक्टरों को दिए जाने वाले उपहारों को नियंत्रित करता है, लेकिन इसे कानूनी रूप से बाध्यकारी बनाने की प्रक्रिया अब भी पाइपलाइन में है।
जन औषधि योजना की सफलता केवल केंद्रों की संख्या बढ़ाने से नहीं, बल्कि "जन विश्वास" और "कानूनी सख्ती" से आएगी। जब तक पर्चे पर ब्रांड के बजाय साल्ट का नाम लिखना अनिवार्य नहीं होता और मेडिकल एथिक्स का उल्लंघन करने वालों पर DCGI कठोर कार्रवाई नहीं करता, तब तक यह असमानता बनी रहेगी।
जहां ब्रांडेड दवाओं की MRP आसमान छूती है, वहीं जन औषधि केंद्र पर 1 रुपये में उपलब्ध सैनिटरी पैड और 50-80% सस्ती दवाएं यह साबित करती हैं कि स्वास्थ्य सेवा सस्ती हो सकती है, यदि 'मुनाफे' से पहले 'मानवता' को रखा जाए।
मनीष सिंह
शाहपुर पटोरी
@ManishSingh_PT