हमीरपुर में 25 बैलगाड़ियों से पहुंची बारात। बुंदेलखंड में 30 साल पुरानी परंपरा फिर हुई जीवित
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में 25 बैलगाड़ियों से पहुंची बारात। बुंदेलखंड में 30 साल पुरानी परंपरा फिर हुई जीवित
हमीरपुर में लगभग 30 वर्षों से विलुप्त हो चुकी बैलगाड़ी से बारात ले जाने की पुरानी परंपरा को दो किसान परिवारों ने पुनर्जीवित किया है। इस पहल ने क्षेत्र में सांस्कृतिक जड़ों को फिर से जोड़ने का काम किया है।
हमीरपुर के अंतिम गांव #गुड़ा निवासी मोहित द्विवेदी (पुत्र जागेंद्र द्विवेदी) की बारात बुधवार को भेड़ी जलालपुर निवासी मोहिनी पाठक (पुत्री विवेक पाठक) के यहां पारंपरिक अंदाज में निकली। दूल्हा और बराती 20 से 25 सजी-धजी बैलगाड़ियों में सवार होकर करीब 4 किलोमीटर का सफर तय कर दुल्हन के घर पहुंचे।
इस बारात का मुख्य आकर्षण तबोरा भजन, महिलाओं द्वारा गाए गए पारंपरिक बुंदेलखंडी गीत और पत्तल में परोसा गया देशी भोजन रहा। मेन्यू में कद्दू, आलू-बैंगन की सब्जी सहित अन्य पारंपरिक व्यंजन शामिल थे।
विवाह की रस्में तीन दिनों तक चलीं। पहले दिन तिलक, दूसरे दिन द्वारचार और तीसरे दिन बेटी की विदाई की रस्म निभाई गई। खास बात यह रही कि दुल्हन की विदाई भी गुरुवार को बैलगाड़ी से ही की गई, जो उपस्थित लोगों के लिए एक यादगार क्षण था।
इस अनूठी बारात को देखने के लिए आसपास के गांवों से हजारों की संख्या में लोग उमड़े। बुजुर्गों ने इसे अपने पुराने दिनों की याद बताया, जबकि युवाओं के लिए यह एक सांस्कृतिक उत्सव जैसा अनुभव था।
दोनों परिवारों की इस पहल की क्षेत्र में सराहना की जा रही है। ग्रामीणों का कहना है कि आधुनिकता के दौर में जहां परंपराएं पीछे छूट रही हैं, वहीं ऐसे आयोजन नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने में सहायक होते हैं।