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“वृद्धों के हिस्से में उपेक्षा, वोट बैंक के हिस्से में बढ़ोतरी?”

मध्य प्रदेश की सामाजिक सुरक्षा नीति पर गंभीर सवाल

मध्य प्रदेश सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में कई लोकलुभावन योजनाओं के जरिए व्यापक राजनीतिक और सामाजिक चर्चा बटोरी है। विशेष रूप से लाडली बहना योजना और मुख्यमंत्री किसान सम्मान निधि जैसी योजनाओं के माध्यम से सरकार ने महिलाओं और किसानों के खातों में नियमित आर्थिक सहायता पहुंचाई है। इन योजनाओं के तहत 1000 से 1250 और 1500 रुपये तक की राशि महिलाओं को दी गई, वहीं किसानों को 2000 रुपये की सम्मान निधि समय-समय पर प्रदान की जाती रही है।

लेकिन इसी तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है—और वही आज प्रदेश की सामाजिक न्याय व्यवस्था पर सबसे बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा कर रहा है।

600 रुपये में जिंदगी? क्या यह सम्मान है या मजाक?
प्रदेश में वृद्धा पेंशन, विधवा पेंशन और विकलांग पेंशन की राशि आज भी मात्र 600 रुपये प्रतिमाह पर सिमटी हुई है। जब महंगाई आसमान छू रही है, दवाइयों के दाम लगातार बढ़ रहे हैं, निजी अस्पतालों का खर्च आम आदमी की पहुंच से बाहर हो चुका है—तब 600 रुपये में एक बुजुर्ग या दिव्यांग व्यक्ति अपना गुजारा कैसे करे?

क्या सरकार यह मानकर चल रही है कि बुजुर्गों की जरूरतें कम होती हैं? क्या विधवा महिला का जीवन 600 रुपये में सुरक्षित और सम्मानजनक बन सकता है? क्या विकलांग व्यक्ति का उपचार, दवा और पोषण 600 रुपये में संभव है?

इन सवालों का जवाब सरकार के पास होना चाहिए।

वोट की राजनीति बनाम सामाजिक न्याय

सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाओं की राशि समय पर खातों में पहुंचती है—यह सकारात्मक पहल है। लेकिन सामाजिक सुरक्षा की मूल भावना क्या है?

क्या यह नहीं कि समाज के सबसे कमजोर वर्ग—वृद्ध, विधवा और विकलांग—को प्राथमिकता दी जाए?

आज जो वर्ग आर्थिक रूप से सबसे अधिक निर्भर है, वही उपेक्षा का शिकार प्रतीत होता है। लाडली बहना योजना की राशि बढ़ती है, किसान सम्मान निधि समय पर आती है—लेकिन पेंशनधारियों की राशि वर्षों से जमी हुई है।

यह भेदभाव नहीं तो और क्या है?

बालाघाट की आवाज: ज्ञापन, मांग और अनसुनी पुकार
जिला बालाघाट जिला सहित प्रदेश के कई हिस्सों में जनता ने ज्ञापन सौंपे, धरना-प्रदर्शन किए, प्रशासन से लेकर शासन तक गुहार लगाई। मांग साफ थी—

वृद्धा, विधवा और विकलांग पेंशन को कम से कम 2000 से 3000 रुपये प्रतिमाह किया जाए।

लेकिन आज तक पेंशन 600 रुपये पर ही अटकी है। क्या यह सामाजिक सुरक्षा का मजाक नहीं?

क्या यह मानवीय संवेदनाओं की अनदेखी नहीं? महंगाई की मार और पेंशन की लाचारी

एक बुजुर्ग व्यक्ति की मासिक दवाइयों का खर्च ही 1000 से 2000 रुपये तक पहुंच जाता है।

राशन, बिजली बिल, कपड़े, इलाज—इन सबका बोझ कौन उठाएगा?

विधवा महिला, जो अक्सर परिवार की जिम्मेदारियों के बीच अकेली रह जाती है—उसके लिए 600 रुपये क्या मायने रखते हैं?

विकलांग व्यक्ति, जो पहले से ही शारीरिक चुनौतियों से जूझ रहा है—उसके लिए यह राशि अपमानजनक नहीं तो क्या है?

क्या सामाजिक न्याय सिर्फ घोषणाओं तक सीमित है? सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि उसकी प्राथमिकता क्या है—लोकलुभावन योजनाओं के जरिए राजनीतिक लाभ या समाज के सबसे कमजोर वर्ग को वास्तविक राहत? यदि लाडली बहना योजना की राशि बढ़ सकती है, यदि किसान सम्मान निधि का विस्तार संभव है—तो फिर वृद्ध, विधवा और विकलांग पेंशन में वृद्धि क्यों नहीं?

क्या सरकार को यह डर है कि बुजुर्ग वोट बैंक संगठित नहीं हैं? या फिर यह वर्ग राजनीतिक रूप से “कम उपयोगी” माना जा रहा है?

अब वक्त है निर्णय का

प्रदेश की जनता यह जानना चाहती है कि—
क्या 600 रुपये में सम्मानजनक जीवन संभव है?

क्या बुजुर्गों की गरिमा इतनी सस्ती है?

सरकार को चाहिए कि वह तुरंत पेंशन राशि की समीक्षा करे और उसे महंगाई के अनुपात में बढ़ाए।

कम से कम 2000 से 3000 रुपये प्रतिमाह की पेंशन तय की जाए, ताकि वृद्ध, विधवा और विकलांग व्यक्ति सम्मान के साथ जीवन यापन कर सकें।

निष्कर्ष: विकास की असली परीक्षा

किसी भी सरकार की असली परीक्षा उसके द्वारा बनाए गए पुलों, सड़कों या घोषणाओं से नहीं होती—बल्कि उससे होती है कि वह अपने सबसे कमजोर नागरिकों के साथ कैसा व्यवहार करती है।यदि प्रदेश में विकास की गंगा बह रही है, तो उसका पहला अधिकार उन बुजुर्गों, विधवाओं और दिव्यांगजनों को मिलना चाहिए जो आज भी 600 रुपये में जिंदगी ढोने को मजबूर हैं।

वरना इतिहास यही लिखेगा—
“सरकार ने योजनाएं बांटी, लेकिन अपने बुजुर्गों को भुला दिया।”

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