
नेपाल की राजनीति में वर्ष,2026 एक निर्णायक मोड़ के रूप में दर्ज हो रही है।
यह केवल सत्ता हस्तांतरण का क्षण नहीं है, बल्कि उस मानसिकता के भी टूटने का संदेश है, जिसने दशकों तक देश को जड़ता में बांधे रखा।गगन थापा का उभार एक ऐसे क्षण का प्रतिनिधित्व करता है, जहां बदलाव बिना हिंसा के हुआ, पर उसका प्रभाव गहरा और दूरगामी होगा।इसे रक्तहीन क्रांति कहा जाना इस लिए भी उचित है, क्यों कि इसने सत्ता की दिशा बदली पर समाज को विभाजित नहीं किया। लम्बे समय तक नेपाल की राजनीति कुछ चुनिंदा चेहरों के इर्द-गिर्द घूमती रही।वही नेता वही गठबंधन वही अस्थिर सरकारें और वही अधूरे वादे।आम मतदाता खासकर युवा पीढ़ी इस म्यूजिकल चेयर से थक चुका था। बेरोज़गारी पलायन और ठहरे हुए विकास ने एक ऐसे असंतोष को जन्म दिया जो धीरे-धीरे राजनैतिक चेतना में बदल गया।गगन थापा ने इस असंतोष को भावनात्मक नारों तक सीमित नहीं रखा बल्कि उसे नीति और नेतृत्व की स्पष्ट मांग में ढाल दिया।यही कारण है कि उनका उभार व्यक्ति केन्द्रित नहीं बल्कि पीढ़ी गत परिवर्तन का प्रतीक बन गया। इस बदलाव का सबसे महत्वपूर्ण पहलू नेपाल फर्स्ट की नीति है।यह नारा मात्र देशभक्ति का उद्घोष नहीं बल्कि एक व्यौहारिक कूटनीतिक दृष्टि का संकेत भी है। इसका मूल भाव यह है कि नेपाल अब बाहरी शक्तियों की प्रतिस्पर्धा में एक निष्क्रिय मोहरा नहीं रहेगा।उसकी विदेश नीति का आधार वैचारिक झुकाव नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हित होंगे। आर्थिक लाभ सुरक्षा संतुलन और नीति स्वायत्तता अब किसी भी अंतरराष्ट्रीय साझेदारी की कसौटी बनेंगे। रणनीतिक तटस्थता की अवधारणा इसी सोच का बिस्तार है।गगन थापा का स्पष्ट संदेश है कि नेपाल किसी एक शक्ति गुट के साथ स्थाई रूप से बंधने की बजाय संतुलन साधने की नीति अपनाएगा।यह तटस्थता निष्क्रिय नहीं, बल्कि सक्रिय होगी।इसका उद्देश्य बाहरी ताकतों से बचते हुए बिकास के लिए अधिकतम अवसर जुटाना है। बुनियादी ढांचा परियोजनाओं का पुनर्मूल्यांकन इसी दिशा में एक साहसिक कदम है।अब किसी भी बड़ी परियोजना को केवल निवेश या निर्माण की गति से नहीं बल्कि दीर्घकालिक ऋण बोझ, रणनीतिक जोखिम और नीति स्वतंत्रता के संदर्भ में परखा जाएगा।यह रुख उन वैश्विक शक्तियों के लिए चुनौती है जो हिमालयी क्षेत्र को अबतक प्रभाव विस्तार के क्षेत्र के रूप में देखती रही हैं। यदि नेपाल अपनी इस नई दिशा पर कायम रहता है तो उसे केवल शर्तें स्वीकार करने वाला देश नहीं, बल्कि शर्तें तय करने वाला राष्ट्र माना जाएगा।यह परिवर्तन पूरे क्षेत्र के लिए एक संदेश होगा। छोटे देश भी स्पष्ट दृष्टि और आत्मविश्वास के साथ अपनी भूमिका पुनर्परिभाषित कर सकते हैं। हालांकि यह मार्ग सरल नहीं है। पुरानी नौकरशाही, संस्थागत जड़ता और सत्ता संतुलन से जुड़े हित इस बदलाव की सबसे बड़ी परीक्षा होंगे। सेना और प्रशासन के भीतर मौजूद पुराने ढांचे को लेकर साथ चलना गगन थापा के लिए एक नाजुक चुनौती होगी। उन्हें तेज सुधार और स्थिर शासन के बीच संतुलन बनाना होगा। अंततः यह रक्तहीन क्रांति तभी सफल मानी जाएगी।जब वह अपेक्षाओं को संस्थागत बदलाव में बदल पाए।यदि ऐसा होता है तो यह क्षण केवल नेपाल का नहीं, बल्कि हिमालयी राजनीति के नये अध्याय का आरम्भ होगा। लेखक आल इंडिया मीडिया एसोसिएशन में वरिष्ठ पत्रकार हैं। mishradhanendra385@gmail.com