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*मेनस्ट्रीम मीडिया की चुनौतियाँ और डिजिटल युग की नई हकीकत*

*मेनस्ट्रीम मीडिया की चुनौतियाँ और डिजिटल युग की नई हकीकत*


आज का मीडिया परिदृश्य पूरी तरह से उलट-पुलट हो चुका है। पारंपरिक अखबार और टेलीविजन चैनल गंभीर संकट में फंसे हुए हैं, जबकि सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म खबरों के मुख्य स्रोत बन गए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि प्रिंट मीडिया का प्रभाव तेजी से कम हो रहा है और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया भी जनता का भरोसा खो चुका है।
हाल की घटनाओं से यह साफ दिखता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वाशिंगटन पोस्ट जैसी प्रतिष्ठित संस्था ने बड़े पैमाने पर कर्मचारियों की छंटनी की, जिसमें सैकड़ों पत्रकार प्रभावित हुए और कई विभाग बंद हो गए। भारत में भी स्थिति चिंताजनक है। कई प्रमुख हिंदी दैनिकों की प्रसार संख्या में लगातार गिरावट आ रही है। कुछ प्रकाशनों ने कई एडिशन बंद कर दिए, जबकि टीवी चैनलों की स्थिति और खराब है—घाटे में चल रहे हैं, वेतन में देरी हो रही है और कई जगहों पर पत्रकारों की छंटनी हो चुकी है।
विज्ञापन का प्रवाह भी बदल गया है। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर विज्ञापन खर्च बढ़ रहा है, जबकि प्रिंट और टीवी पर यह घट रहा है। कोरोना के बाद कई अखबार और पत्रिकाएं बंद हुईं, जिससे पारंपरिक मीडिया की कमजोरी और उजागर हुई।
सोशल मीडिया ने खबरों के प्रसार की गति और पहुंच को बदल दिया है। कोई घटना होती है, तो सबसे पहले X, यूट्यूब या फेसबुक पर ही फैलती है। राजनीतिक प्रदर्शन, स्थानीय विवाद या बड़े मुद्दे—सभी में सोशल मीडिया आगे रहता है। लोग अब पारंपरिक चैनलों की बजाय व्यक्तिगत क्रिएटर्स, इंडिपेंडेंट जर्नलिस्ट्स और सोशल हैंडल्स पर भरोसा करते हैं, क्योंकि वहां खबरें तेज, बिना फिल्टर के और कई बार अधिक पारदर्शी लगती हैं।
पारंपरिक मीडिया की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं। कई बार खबरों में पक्षपात, सनसनी फैलाना या सत्ता के पक्ष में खड़े होना दिखता है, जिससे जनता दूर होती जा रही है। नतीजा यह है कि ब्रेकिंग न्यूज और गहन विश्लेषण अब मुख्य रूप से डिजिटल माध्यमों से मिलता है।
भविष्य की बात करें तो प्रिंट मीडिया पूरी तरह खत्म नहीं होगा, लेकिन उसका रूप बदल जाएगा। यह स्थानीय मुद्दों, गहन रिपोर्टिंग और प्रीमियम कंटेंट पर फोकस करेगा, जबकि त्वरित अपडेट और लाइव कवरेज डिजिटल प्लेटफॉर्म संभालेंगे। टीवी चैनल भी ऑनलाइन स्ट्रीमिंग और हाइब्रिड मॉडल की ओर बढ़ रहे हैं। अगले दशक में डिजिटल मीडिया का वर्चस्व और मजबूत होगा, लेकिन ग्रामीण इलाकों में जहां इंटरनेट सीमित है, वहां प्रिंट का महत्व बना रहेगा।
जो युवा पत्रकारिता में कदम रखना चाहते हैं, उनके लिए यह समय सावधानी और तैयारी का है। उन्हें डिजिटल टूल्स, मल्टीमीडिया स्टोरीटेलिंग, डेटा एनालिसिस, सोशल मीडिया जर्नलिज्म और वीडियो कंटेंट बनाने की स्किल्स सीखनी होंगी। केवल पुरानी शैली की रिपोर्टिंग पर निर्भर रहना जोखिम भरा हो सकता है। भविष्य उन पत्रकारों का है जो नई तकनीक के साथ तालमेल बिठा सकें, सच्चाई पर अडिग रहें और दर्शकों तक निष्पक्ष जानकारी पहुंचा सकें।
मीडिया का असली उद्देश्य—समाज को जागरूक करना और सत्य सामने लाना—वही रहेगा, लेकिन तरीके बदल रहे हैं। यह बदलाव चुनौती के साथ-साथ नए अवसर भी ला रहा है।

*(हरिशंकर पाराशर)*
पत्रकार
*(जर्नलिस्ट कौंसिल ऑफ़ इंडिया एमपी संयोजक,)*

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