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वैचारिक पाखंड की पोल: तुलसी के 'ताड़ना' पर बवाल, तो कबीर के 'विष की बेल' पर चुप्पी क्यों?

— डॉ. महेश प्रसाद मिश्रा, भोपाल

भारतीय साहित्य और भक्ति परंपरा के दो स्तंभ—गोस्वामी तुलसीदास और संत कबीरदास। पिछले कुछ समय से एक विशेष वैचारिक खेमे ने तुलसीदास जी की 'रामचरितमानस' के एक-दो चौपाइयों को लेकर समाज में विभाजन और विवाद का जहर घोलने की कोशिश की है। लेकिन सवाल यह उठता है कि जो लोग तुलसीदास को 'नारी विरोधी' सिद्ध करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं, उन्हें कबीरदास की वाणी में छिपी तीखी चेतावनियां और स्त्रियों के प्रति उपहास क्यों नहीं दिखता? क्या यह आलोचना केवल एजेंडे पर आधारित है?
कबीर के दोहे: जब 'सांप' से भी खतरनाक बताई गई नारी की छाया
समानता और प्रगतिशीलता का झंडा उठाने वाले बुद्धिजीवियों के लिए कबीर के ये शब्द किसी आईने से कम नहीं हैं। कबीरदास जी ने स्पष्ट कहा है:
"नारी की झांई पड़त, अंधा होत भुजंग..."
अर्थात् नारी की छाया मात्र से सांप अंधा हो जाता है। इतना ही नहीं, कबीर ने नारी को 'विष की बेल', 'काली नागिन' और 'बीस फन वाली नागिन' तक की संज्ञा दी है। उन्होंने साफ चेतावनी दी कि नारी के साथ रहने वालों की क्या गति होगी, इसका अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता।

तुलसी पर कुतर्क, कबीर पर मौन: यह दोहरा मापदंड क्यों?
अल्पज्ञानी और आधुनिकता का चोला ओढ़े लोग तुलसीदास के 'ढोल गँवार शूद्र पशु नारी' वाले दोहे के पीछे हाथ धोकर पड़े हैं, जबकि उसका अर्थ अनुशासन और मर्यादा के संदर्भ में था। परंतु वही लोग कबीर के उन दोहों पर पूरी तरह मौन धारण कर लेते हैं जहाँ वे नारी को नरक का द्वार या विनाश का कारण बताते हैं।
इसका सीधा कारण है—सुविधा की राजनीति। तुलसीदास को निशाना बनाना एक विशेष सांस्कृतिक एजेंडे को सूट करता है, जबकि कबीर को उनके 'क्रांतिकारी' छवि के कारण बचा लिया जाता है।

संतों की वाणी: काल और परिस्थिति का बोध
वास्तव में, न तुलसीदास नारी विरोधी थे और न ही कबीर। संत और महात्मा जब भी समाज को संबोधित करते हैं, वे तत्कालीन सामाजिक बुराइयों, इंद्रिय संयम और वैराग्य के संदर्भ में बात करते हैं। कबीर ने 'कामिनी' शब्द का प्रयोग साधकों को वासना से दूर रखने के लिए किया था, न कि किसी मां, बहन या बेटी के अपमान के लिए। यही स्थिति तुलसीदास जी की भी थी।
निष्कर्ष: आईना देखने का समय
समाज के तथाकथित 'प्रगतिशील' ठेकेदारों को यह समझना होगा कि आधा अधूरा ज्ञान समाज के लिए घातक है। 500 साल पुरानी रचनाओं को आज के संदर्भ में तोड़-मरोड़ कर पेश करना केवल विद्वेष फैलाना है। यदि आप तुलसी की आलोचना करते हैं, तो साहस दिखाएं और कबीर के भी उन पदों पर चर्चा करें जो आज के मानदंडों पर 'कठोर' प्रतीत होते हैं। अन्यथा, अपनी वैचारिक कट्टरता को 'समाज सुधार' का नाम देना बंद करें।

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