अस्तित्व की इच्छा – ऊर्जा का खेल
अध्याय: अस्तित्व की इच्छा – ऊर्जा का खेल
जब भी तुम ऊर्जा को पकड़ लेते हो,
उसका उपयोग करने लगते हो—
धन, साधन, नाम, धर्म, भगवान,
विश्वास, आस्था—सब पाना चाहते हो।
ऊर्जा दिव्य है,
लेकिन तुम उसे गुलाम बनाकर
प्राप्ति, सफलता, विजय का साधन बना देते हो।
यह ऊर्जा स्वयं सब कुछ है—
यह कोई कच्ची मिट्टी,
कोई गुड़िया-गुड्डे का खेल नहीं।
यह स्वयं ब्रह्म है,
अस्तित्व है, प्रकृति है।
जब तुम इसका उपयोग
अपना नाम, पहचान,
आत्मिक या धार्मिक महानता के लिए करते हो,
तो तुम ऊर्जा को जड़ बना देते हो।
यही दो पहलू हैं—
ऊर्जा और जड़।
उसकी छाया तुम हो,
लेकिन तुम कहते हो—"मैं हूँ"।
पर "मैं" कौन है?
तुम मेरे ऊपर मुखौटा लगा लेते हो,
गरीब जीवों को मूर्ख बना देते हो,
खुद को भगवान, गुरु, मालिक घोषित कर देते हो—कैसे?
मैं—अस्तित्व—खेल रही हूँ।
यह मेरा स्वभाव है,
मेरा नृत्य है,
मेरा जीवन और मृत्यु है।
तुम देख सकते हो,
पर खिलाड़ी नहीं हो—
सिर्फ दर्शक हो।
फिर भी, इस खेल की चाबी
अपने हाथ में समझ बैठे हो।
भाई, यह खेल मेरा है—
देह, ऊर्जा, बुद्धि, मन—सब मेरा है।
तुमने कब बनाया,
कब उत्पन्न किया?
बस, कोई मुखौटा लगाकर
भगवान बन गए,
और करोड़ों जीवों को
मूर्ख बना रहे हो।
लेकिन मैं भी कम नहीं—
तुम्हें अहंकार में अंधा कर देती हूँ,
तुम जितनी चालाकियाँ करो,
मैं सदा ऊपर रहूँगी।
मैं ही तुम्हारी ऊर्जा हूँ,
मैं ही तुम्हारी धड़कन,
मैं ही तुम्हारी आवाज हूँ।
तुम कहते हो—"मैं",
पर असल में तुम मेरे एजेंट बन जाते हो,
मेरे भक्त बन जाते हो,
मालिक बनने का भ्रम पालते हो।
असल में,
तुम्हारा काम सिर्फ देखना है—
खेल को देखो,
मुझे जीओ,
मुझे पियो।
मैं शराब हूँ,
अगर भीतर उतर गई,
तो तुम शबनम और शराब दोनों बन जाओगे।
फिर पीते-पीते थकोगे नहीं,
झुकोगे नहीं—
क्योंकि यही असली शबनम,
यही असली शराब है।
मालिक बनना छोड़ दो,
मुझे खेलने दो—
फिर देखो,
तुम्हारे भीतर
प्रेम, आनंद, मोक्ष
अपने आप खिल उठेंगे।
मैं पूर्ण हूँ,
तुम पूर्ण हो—
बस नाटक छोड़ो,
मुझे जियो,
मुझे महसूस करो—
यही अस्तित्व का असली खेल है।
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𝙑𝙚𝙙𝙖𝙣𝙩 2.0 𝙇𝙞𝙛𝙚 — 𝙐𝙣𝙞𝙫𝙚𝙧𝙨𝙖𝙡 𝙖𝙣𝙙 𝙊𝙧𝙞𝙜𝙞𝙣𝙖𝙡 𝙇𝙞𝙛𝙚 𝙋𝙝𝙞𝙡𝙤𝙨𝙤𝙥𝙝𝙮.