
मनुष्य खोजता है।
कुछ पाने के लिए… कुछ बनने के लिए…
और उसे लगता है कि कहीं कोई अंतिम सुख छिपा है।
जीवन कोई मंज़िल नहीं है।
यह केवल यात्रा भी नहीं — यह स्वयं चलना है।
मनुष्य खोजता है।
कुछ पाने के लिए… कुछ बनने के लिए…
और उसे लगता है कि कहीं कोई अंतिम सुख छिपा है।
पर जितना वह खोजता है — उतना उसकी ऊर्जा बाहर बहती जाती है।
और जब कुछ मिल जाता है… तब भीतर एक अजीब रिक्तता खड़ी मिलती है।
क्यों?
क्योंकि सुख वस्तु नहीं है।
सुख कोई परिणाम नहीं है।
सुख तो बस एक क्षणिक छाया है — जो आती है, और चली जाती है।
प्रकृति स्थिरता नहीं देती।
प्रकृति का धर्म है — परिवर्तन।
जो सुख मिला है, वह दुःख में बदलेगा।
जो दुःख आया है, वह भी बदल जाएगा।
यह खेल बंद नहीं होता — क्योंकि यही जीवन की धड़कन है।
मनुष्य की सबसे बड़ी भूल क्या है?
वह सोचता है —
“पहले सब स्थिर हो जाए… धन आ जाए… व्यवस्था बन जाए…
फिर मैं जीऊँगा।”
लेकिन जीवन प्रतीक्षा नहीं करता।
जो आज नहीं जीता — वह कभी नहीं जीता।
इतिहास में देखो…
रावण, सिकंदर, कंस —
ये केवल व्यक्ति नहीं, मन की अवस्थाएँ हैं।
जब मन कहता है —
“मैं पकड़ूँगा, रोकूँगा, स्थायी बना दूँगा”
तब वह जीवन को कैद करना चाहता है।
और जीवन कैद नहीं होता।
जो अस्तित्व के नियम को स्वीकार करता है — वह बहता है।
जो उसे चुनौती देता है — वह टूटता है।
आस्तिक और नास्तिक का असली फर्क यहीं है:
आस्तिक — जो कहता है, “मैं प्रवाह हूँ।”
नास्तिक — जो कहता है, “मैं पत्थर हूँ।”
और पत्थर में ऊर्जा नहीं बहती।
भीतर का खालीपन क्यों बढ़ता है?
क्योंकि बाहर फैलाव हुआ — भीतर लौटना भूल गए।
बाहर जो पाया — वह भीतर नहीं उतरा।
और फिर एक क्षण आता है…
जब मनुष्य खाली हाथ खड़ा होता है।
तब उसे पहली बार दिखता है:
जीवन पाने की चीज नहीं था।
जीवन तो स्वयं वह था — जो खोज रहा था।
बस…
यहीं से यात्रा नहीं, जागरण शुरू होता है।
वेदांत 2.0