मार्ग — पाना और जीना ✦
वेदांत 2.0
✍🏻 — अज्ञात अज्ञानी
मार्ग — पाना और जीना ✦
वेदांत 2.0
✍🏻 — अज्ञात अज्ञानी
इस जगत में मूलतः दो ही मार्ग हैं —
एक पाने का, दूसरा जीने का।
इन दोनों को समझ लिया, तो शेष कुछ भी जानना आवश्यक नहीं रहता।
पहला मार्ग है — पाना।
पाना यानी उपलब्धि, लक्ष्य, संग्रह, पहचान।
यहाँ मनुष्य सुख भी पाना चाहता है और दुःख से बचना भी।
लेकिन अंत में भूख वही रहती है — वासना की भूख, चाह की भूख।
कुछ पा लेने के बाद भी भीतर खालीपन बना रहता है, क्योंकि पाने का मार्ग स्वयं इच्छा से जन्मा है और इच्छा का अंत नहीं होता।
इस मार्ग के साथ शिक्षा, विज्ञान, धन, साधन, सत्ता, नाम, प्रतिष्ठा जुड़ी हुई हैं।
योग, धर्म, दर्शन भी कई बार पाने के साधन बन जाते हैं — मोक्ष पाने के लिए, ईश्वर पाने के लिए, स्वर्ग पाने के लिए।
लेकिन जहाँ पाना है, वहाँ तुलना है; जहाँ तुलना है, वहाँ असंतोष का बीज छिपा ही रहता है।
जरूरत तक साधन ठीक हैं।
भोजन, वस्त्र, शरीर की देखभाल — यह जीवन की आवश्यकताएँ हैं।
लेकिन अधिक सुख की खोज अधिक दुःख को भी साथ लाती है।
इतिहास में लाखों उदाहरण हैं उन लोगों के जिन्होंने बहुत पाया — पर संतोष नहीं पाया।
दूसरा मार्ग है — जीना।
यहाँ न ईश्वर की खोज है, न आत्मा की सिद्धि, न समाधि, न मोक्ष, न स्वर्ग।
यहाँ केवल जीवन है — जैसा है, वैसा।
जीने के मार्ग में कोई नाम नहीं टिकता।
ईश्वर, धर्म, मुक्ति — ये सब मन की कल्पनाएँ हो सकती हैं, मन की भाषा हो सकती हैं;
लेकिन जीने वाले के लिए जीवन ही पर्याप्त है।
मैं किसी नाम के साथ नहीं हूँ।
न किसी उपलब्धि के साथ।
क्योंकि जो मिल सकता है — वह मेरी भाषा नहीं।
मैं केवल हूँ।
ना कल की इच्छा, ना भविष्य की कल्पना, ना अतीत की पकड़।
सिर्फ यह वर्तमान — पर्याप्त, पूर्ण।
जो पाते हैं, उनके लिए उपलब्धियाँ मूल्यवान हैं —
क्योंकि उन्होंने जीवन खोकर उन्हें पाया है।
और जिनके पास जीवन नहीं है, उनके लिए पाने वाला ही भगवान बन जाता है।
लेकिन जहाँ जीवन है, वहाँ भगवान की आवश्यकता नहीं बचती।
जहाँ अनुभव जीवित है, वहाँ सिद्धांत फीके पड़ जाते हैं।
मूर्ति हो सकती है —
लेकिन उसमें तुम्हारा, मेरा, सबका समान संबंध है।
जीवित प्रेम ही जीवन है;
अधीनता प्रेम नहीं है।
यदि कुछ पाना है, तो विज्ञान चाहिए —
मन की ऊर्जा को समझना होगा, इंद्रियों की दिशा देखनी होगी।
अन्यथा ऊर्जा वस्तुओं के पीछे भागती रहेगी और मनुष्य स्वयं को खो देगा।
जीवन जीना सरल है —
जरूरत भर ऊर्जा खर्च करो, शेष में बस जीओ।
दो समय का भोजन, शरीर का वस्त्र — इतना काफी है।
बाकी जो है, वह जीवन का प्रवाह है।
मैं कुछ सिखाने नहीं आया।
मैं बादल की तरह बरस रहा हूँ।
हवा की तरह बह रहा हूँ।
नदी की तरह चल रहा हूँ।
जिसे समझना है, समझे; जिसे नहीं समझना, उसे भी कोई बाध्यता नहीं।
मुझे नहीं पता कौन भगवान है, कौन देवता, कौन अच्छा, कौन बुरा।
अस्तित्व अपने नियम से चल रहा है।
तुम मालिक हो — तुम्हारे पास “मैं” है, जिससे संसार खेला जा सकता है।
और मैं केवल देखता हूँ — तुम्हारी हार, तुम्हारी जीत, तुम्हारा सुख, तुम्हारा दुःख —
और मुस्कुराता हूँ कि कैसी लीला रची है इस कुदरत ने।
कुछ पाने की आवश्यकता नहीं।
मैं प्राप्त नहीं — पर्याप्त हूँ।
संतुष्ट हूँ।
बस हूँ।
✦ अज्ञात अज्ञानी — वेदांत 2.0 ✦