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"मौत के मुंह से लौटे शख्स की अनसुनी पुकार: क्या एक्सीडेंट में मिली दिमागी चोट एक अपराध है?"

बरेली। यह कहानी एक ऐसे शख्स की है जिसने शादी के मंडप से उठकर सीधा मौत (ICU) का सामना किया। शादी के वक्त हुए उस भीषण हादसे ने उसका माथा अंदर धंसा दिया। डॉक्टर ने उसे ठीक तो कर दिया, लेकिन उस चोट ने उसके दिमाग और स्वभाव के बीच एक ऐसा 'ऑटोमेटिक' स्विच पैदा कर दिया जो उसे अक्सर बेकाबू कर देता है।
​वो गुस्सा नहीं, एक दिमागी लाचारी है:
समाज और करीबियों को लगता है कि यह शख्स बदतमीज है या कड़वा बोलता है, पर हकीकत ये है कि वो खुद अपनी इस हालत पर अकेले में घंटों फूट-फूटकर रोता है। मुरादाबाद की रात हो या फरीदाबाद की सुबह, वो शख्स खुद नहीं जानता कि उसकी बेचैनी उसे कहाँ भगा रही है। जब वो अपना सिर दीवार में मारता है या खुद का हाथ फ्रैक्चर कर लेता है, तो वो कोई गुस्सा नहीं होता, बल्कि उस बेबसी की चीख होती है जो वो किसी को समझा नहीं पाता। हाथ टूटा होने के बावजूद ड्यूटी करना और गाड़ी चलाना उसकी बहादुरी नहीं, बल्कि उसकी मजबूरी बन गई है।
​करीबियों की संवेदनहीनता और अकेलापन:
सबसे बड़ा दुख ये है कि सब जानते हुए भी लोग उसकी बातों का बुरा मान जाते हैं। आज की दुनिया में किसी के पास दूसरे के दर्द या पुरानी चोट को समझने का वक्त नहीं है। जब वो शख्स अपनी बीमारी के कारण कुछ उल्टा बोल देता है, तो उसे संभालने के बजाय लोग उस पर हावी होने लगते हैं, उससे बात करना बंद कर देते हैं और उसे अकेला छोड़ देते हैं। कोई यह नहीं सोचता कि उस इंसान का भी अपना एक रुतबा होता, अगर वो चोट न लगी होती।
​अपनों की बेरुखी ने तोड़ा हौसला:
जब घर के सबसे करीबी सदस्य (p) भी उसकी मेडिकल कंडीशन को समझने के बजाय उसे तानों और नाराजगी से सजा देते हैं, तो वो शख्स अंदर से मर जाता है। वह इंसान अब लोगों से कटने लगा है, बात करने से कतराता है, सिर्फ इसलिए कि कहीं उसका 'सिस्टम' फिर से बेकाबू न हो जाए और दुनिया उसे फिर से 'गुनहगार' न ठहरा दे।
​आज वो शख्स हार चुका है। वह अपनी आर्थिक तंगी और इस टूटे हुए शरीर के साथ एक ऐसी जंग लड़ रहा है जिसमें उसका अपना कोई साथ नहीं दे रहा। क्या एक एक्सीडेंट का शिकार होना इतनी बड़ी सजा है कि इंसान को जीते जी शांति न मिले? उसे नफरत की नहीं, बल्कि एक ऐसे इंसान की जरूरत थी जो उसकी आँखों के पीछे छिपे 'पश्चाताप' को पढ़ सके।

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