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अभागा बैतूल – नदियों का मायका, माँ ताप्ती की पुकार।

अभागा बैतूल – नदियों का मायका, माँ ताप्ती की पुकार। मैं बैतूल हूँ। पहाड़ों की गोद में पला, जंगलों की साँसों में बसा और नदियों को जन्म देने वाली पवित्र धरती। मेरी पहचान केवल एक जिला नहीं, मैं नदियों का मायका हूँ, जीवन का उद्गम हूँ, जल का संस्कार हूँ। मेरी गोद से अनेक नदियाँ जन्म लेती हैं, पर मेरी आत्मा, मेरा गर्व, मेरी शान है माँ ताप्ती। मुलताई की पावन भूमि से जब माँ ताप्ती प्रकट होती है तो वह केवल जलधारा नहीं होती, वह प्रकृति का आशीर्वाद होती है, जीवन की गारंटी होती है। उसकी हर बूंद में अमृत है, हर लहर में संस्कृति है, हर प्रवाह में इतिहास बहता है। वह जंगलों को जीवन देती है, खेतों को हरियाली देती है, गाँवों की प्यास बुझाती है, शहरों को सहारा देती है। करोड़ों लोगों की साँसें उसकी धारा से जुड़ी हैं। लेकिन आज वही माँ ताप्ती पुकार रही है और उसका मायका बैतूल शर्म से सिर झुकाए खड़ा है। जिस माँ को हमने देवी कहा, जिसके नाम पर दीप जलाए, उसी माँ की गोद में आज गंदगी डाली जा रही है। नालों का काला जहर, घरों का मलजल, प्लास्टिक का जहर, कचरे का बोझ सब उसी माँ के हिस्से। उसका स्वच्छ प्रवाह तड़प रहा है, उसकी धारा घुट रही है। इतना ही नहीं, माँ ताप्ती के किनारों पर तथाकथित समाज के ठेकेदारों ने अतिक्रमण कर रखा है, उन्होंने माँ का प्राकृतिक मार्ग रोक दिया है। जो लोग अपनी ही जीवनदायिनी माँ का रास्ता घेर लेते हैं, वे सच में बड़े अभागे हैं। यह केवल जमीन पर कब्जा नहीं, यह प्रकृति के नियमों के खिलाफ अपराध है, आने वाली पीढ़ियों के अधिकारों पर डाका है। और सबसे बड़ा दर्द तब होता है जब कुछ जनप्रतिनिधि और तथाकथित समाजसेवक सेवा नहीं, दिखावा करने आते हैं। कैमरे चमकते हैं, गुलदस्ते सजते हैं, भाषण गूंजते हैं, लेकिन माँ ताप्ती की धारा वैसी की वैसी गंदी बहती रहती है। यह सेवा नहीं, यह संवेदनहीनता है। मैं बैतूल हूँ और यह अन्याय देखकर खुद को अभागा कहता हूँ। और सुन लो, मैं केवल ताप्ती का ही नहीं, मैं कई नदियों का जन्मस्थान हूँ। यहीं से वर्धा निकलती है, यहीं से माचना जन्म लेती है, यहीं से तवा बहती है, यहीं से गंजाल, बेल और मोरण की धाराएँ निकलती हैं। तपश्री आश्रम की ऊँची पहाड़ियों से काजल, गंजाल, मोरण, भाजी और खण्डु नदियों के एक साथ उद्गम की मान्यता इस धरती की महानता का प्रमाण है। सोचो, एक ही जिले की गोद से इतनी नदियाँ जन्म लेती हैं, फिर भी हम उन्हें बचा नहीं पा रहे, इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा। नदी केवल पानी नहीं, नदी जीवन है, नदी अन्न है, नदी संस्कृति है, नदी भविष्य है। अगर नदी बीमार होगी तो समाज भी बीमार होगा। अगर नदी मरेगी तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें कभी माफ़ नहीं करेंगी। अब समय आ गया है कि हम जागें। हर घर से संकल्प उठे कि गंदगी नदी में नहीं जाएगी। हर नागरिक नदी को माँ माने। जनप्रतिनिधि भाषण नहीं, कार्य करें। समाजसेवक फोटो नहीं, सफाई करें। जिस दिन यह जागरूकता आग बनकर फैलेगी, उस दिन अभागा बैतूल फिर से गर्व से सीना तानकर कहेगा मैं बैतूल हूँ, नदियों का मायका, माँ ताप्ती का जन्मस्थान, और अब मैं अभागा नहीं, जागा हुआ बैतूल हूँ।

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