जीवन को जीना ही मार्ग है।
गुरु मत बनो, शिष्य मत बाँधो,
संस्था मत बनाओ — यह सब नया बंधन है।
सिर्फ संकेत पर्याप्त है।
अंतिम संकेत — वेदांत 2.0 ✧
लाखों लोग अंतिम अवस्था में भी उपाय नहीं छोड़ते।
कोई मंत्र पकड़े है, कोई गुरु, कोई भगवान, कोई शास्त्र।
छोड़ने से डरते हैं — कहीं अनर्थ न हो जाए।
यह पकड़ ही बंधन है।
गुरु पकड़े हैं, शिष्य पकड़े हैं,
पहली उंगली जो पकड़ी थी — जन्मों से वही पकड़े हैं।
जैसे वृद्ध शरीर नहीं छोड़ता —
वैसे ही भक्त अपनी कल्पना नहीं छोड़ता।
दर्शन की आशा, वरदान की प्रतीक्षा,
सिद्धि का स्वप्न, चमत्कार का लोभ —
यही माया का जाल है।
कहानियाँ आशा देती हैं —
पर अस्तित्व वचन नहीं देता।
भीतर आनंद घटता है —
धीरे, स्वभाव से, बिना उपाय।
फूल एक झटके में नहीं खिलता।
स्वप्न छोड़ो।
पकड़ छोड़ो।
डर छोड़ो।
जीवन को जीना ही मार्ग है।
गुरु मत बनो, शिष्य मत बाँधो,
संस्था मत बनाओ — यह सब नया बंधन है।
सिर्फ संकेत पर्याप्त है।