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श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर का प्राकट्य दिवस के साथ स्वर कोकिला लता मंगेशकर जी की पुण्यतिथि पर उन्हें कोटि-कोटि प्रणाम।

भारत रत्न से सम्मानित सादगी व सौम्यता की प्रतीक स्वर कोकिला लता मंगेशकर जी की पुण्यतिथि पर उन्हें कोटि-कोटि प्रणाम।
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प्रेम और शक्ति का संतुलन आत्मा को स्पष्ट और शांत दृष्टि देता है। जब मन स्थिर होता है, तो निर्णय दबाव से नहीं, बल्कि विवेक और सत्य के आधार पर होते हैं।
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आज श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर का प्राकट्य दिवस,शुक्रवार, 6 फरवरी 2026 को मनाया जा रहा है।
भक्ति सिद्धांत सरस्वती ठाकुर श्रील प्रभुपाद के आध्यात्मिक गुरु हैं। कृष्ण चेतना में उनके निर्भीक प्रचार के कारण उन्हें सिंह गुरु के नाम से जाना जाता है। उन्होंने श्रीधाम मायापुर के योगपीठ में भगवान चैतन्य के प्रकटस्थान का उत्खनन किया और पूरे भारत में 64 गौड़िया मठों की स्थापना की।
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एक भक्त, श्री कृष्ण से किसी भी वस्तु/ इच्छा की प्राप्ति हेतु प्रार्थना नहीं करता है। वह तो केवल प्रेमवश उनकी आराधना करता है। यही है शुद्ध प्रेम।

(श्रील प्रभुपाद,6 फरवरी 1971, गोरखपुर)
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सब कुछ एक दूसरे पर निर्भर है। हम भी निर्भर हैं। प्रकाश, हवा, बारिश या पानी के बिना हम कैसे जी सकते हैं? इसलिए हम पूरी तरह से निर्भर हैं, लेकिन झूठे घमंड और कम बुद्धि के कारण हम सोचते हैं कि हम स्वतंत्र हैं, हम... "मैं भगवान हूँ। मैं कुछ भी कर सकता हूँ।" यह राक्षसी सोच है।

(श्रील प्रभुपाद,6 फरवरी 1975, होनोलूलू)
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साधारण मक्खियाँ ढूँढती रहती हैं कि कहाँ घाव है और मधुमखियाँ ढूंढती हैं कि शहद कहाँ है। तो ये दो वर्ग हैं - दोष ढूँढने वाले और सद्गुण एकत्र करने वाले। इसी प्रकार ऐसे अनेक मूर्ख है जो केवल दोष देखते हैं। निन्दा का अर्थ है कि आपके अन्दर अच्छे गुण हैं फिर भी मैं आपको बदनाम करने का प्रयास कर रहा हूँ। सज्जन व्यक्ति दुर्गुणों की उपेक्षा कर केवल अच्छे गुण देखते हैं।

(श्रील प्रभुपाद,मायापुर, 6 फरवरी 1976 )

Hare Krishna 💫

कहते हैं कि आज भी जगन्नाथ जी की प्रतिमा के भीतर वही दिव्य "नबि–ब्रह्म" (हृदय) धड़कता है। इसी कारण जगन्नाथ जी की मूर्तियाँ समय-समय पर "नवकलेवर" नामक अनुष्ठान में बदली जाती हैं, परन्तु भीतर का ब्रह्म तत्व अगली मूर्ति में स्थानांतरित किया जाता है।

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👉आज की कक्षा Prabhuji द्वारा 👇

श्रीमद्भागवतम (SB) 4.30.3 के अनुसार, राजा प्राचीनाबर्ही के पुत्रों (प्रचेता) ने अपने पिता के आदेश का पालन करते हुए समुद्र में कठोर तपस्या की। भगवान शिव द्वारा दिए गए मंत्रों का जाप करके, उन्होंने भगवान विष्णु को प्रसन्न किया और भक्ति सेवा में सफलता प्राप्त की।

श्लोक का सार👇

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Bhagavad Gita Verse Of the Day:Chapter 13 Verse 13👇

ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्र्नुते |
अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते || १३ ||

ज्ञेयम् - जानने योग्य; यत् - जो; तत् - वह; प्रवक्ष्यामि - अब मैं बतलाऊँगा; यत् - जिसे; ज्ञात्वा - जानकर; अमृतम् - अमृत का; अश्नुते - आस्वादन करता है; अनादि - आदि रहित; मत्-परम् - मेरे अधीन; ब्रह्म - आत्मा; न - न तो; सत् - कारण; तत् - वह; न - न तो; असत् - कार्य, प्रभाव; उच्यते - कहा जाता है |

Translation👇

अब मैं तुम्हें ज्ञेय के विषय में बतलाऊँगा, जिसे जानकर तुम नित्य ब्रह्म का आस्वादन कर सकोगे | यह ब्रह्म या आत्मा, जो अनादि है और मेरे अधीन है, इस भौतिक जगत् के कार्य-करण से परे स्थित है |

Commentary👇

भगवान् ने क्षेत्र तथा क्षेत्रज्ञ की व्याख्या की | उन्होंने क्षेत्रज्ञ को जानने की विधि की भी व्याख्या की | अब वे ज्ञेय के विषय में बता रहे हैं - पहले आत्मा के विषय में, फिर परमात्मा के विषय में | ज्ञाता अर्थात् आत्मा तथा परमात्मा दोनों ही ज्ञान से मनुष्य जीवन-अमृत का आस्वादन कर सकता है | जैसा कि द्वितीय अध्याय में कहा गया है, जीव नित्य है | इसकी भी यहाँ पुष्टि हुई है | जीव के उत्पन्न होने की कोई निश्चित तिथि नहीं है | न ही कोई परमेश्र्वर से जीवात्मा के प्राकट्य का इतिहास बता सकता है | अतएव वह अनादि है | इसकी पुष्टि वैदिक साहित्य से होती है - न जायते म्रियते वा विपश्चित् (कठोपनिषद् १.२.१८) | शरीर का ज्ञाता न तो कभी उत्पन्न होता है, और न मरता है | वह ज्ञान से पूर्ण होता है |
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वैदिक साहित्य में (श्र्वेताश्र्वतर उपनिषद ६.१६) भी परमेश्र्वर को परमात्मा रूप में - प्रधान क्षेत्रज्ञपतिर्गुणेशः- शरीर का मुख्य ज्ञाता तथा प्रकृति के गुणों का स्वामी कहा गया है | स्मृति वचन है - दासभूतो हरेरेव नान्यस्यैव कदाचन | जीवात्माएँ सदा भगवान् की सेवा में लगी रहती हैं | इसकी पुष्टि भगवान् चैतन्य के अपने उपदेशों में भी है | अतएव इस श्लोक में ब्रह्म का जो वर्णन है, वह आत्मा का है और जब ब्रह्म शब्द जीवात्मा के लिए व्यवहृत होता है, तो यह समझना चाहिए कि वह आनन्दब्रह्म न होकर विज्ञानब्रह्म है | आनन्द ब्रह्म ही परब्रह्म भगवान् है |

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