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सरहदों पर दुश्मन से किस्मत ही आन बचाए। पर सरहद के भीतर बैठे दुश्मन से भला कौन बचाए।।

होशियारपुर: 6th फरवरी,2026 (बूटा ठाकुर गढ़शंकर)
एक फौजी जब अपनी ड्यूटी पर होता है और उसे सरहदों के दुश्मनों से दो दो हाथ करने का मौका मिलता है तो बिना जान की प्रवाह किए दुश्मनों का सामना करता है। अपना घर परिवार सब कुछ भुला कर एक ही धुन पर सवार होता है कि दुश्मन को मिट्टी में मिला कर ही दम लूंगा। बहुत से सैनिक शहीद भी हो जाते हैं और जो बच जाते हैं उन्हें किस्मत का सहारा होता है।
किंतु जब वह अपनी फौजी सेवाओं से निवृत होकर घर लौटता है तो उसका जीवन महफूज़ नहीं होता। बजाय इसके कि आसपास के लोग या रिश्तेदार उसे बनता सम्मान दें बलकि ऐसा माहौल बन जाता है कि जिसमें ईर्ष्या, द्वेष, कलह और दुश्मनी जैसी बुराइयां उसके आसपास मंडराने लगती हैं। होना तो यह चाहिए कि जब कोई फौजी अपनी सेवाओं से निवृत होकर घर लौटे तो उसका जिला प्रशासन की तरफ से पूरा सम्मान किया जाए ताकि लोगों में उसके प्रति सद्भावना, इज्जत और मान सम्मान की भावना जागृत हो। और साबका सैनिक को उम्दा अनुकूल वातावरण मिल सके और समाज सेवा में अपना योगदान दे सके। पर ऐसा नहीं होता जिसके चलते एक साबका सैनिक को अनेकों मुश्किलों के साथ जीना पड़ता है। उसे तो पता भी नहीं चलता कि जिनके लिए वह तकलीफें झेलकर आया है वही उसके जानी दुश्मन बने हुए हैं।
ताज़ा ख़बर मिली है कि तरन तारण के गांव चीमा खुर्द का एक साबका सैनिक गुरमेज सिंह (36) कुछ समय पहले सेना से लौटा और समाज की भलाई हेतु गांव का सरपंच चुन लिया गया। पर उसे क्या पता था कि यह उसके लिए जान लेवा घातक सिद्ध होगा। चुनाव की रंजिश गांव के साबका सरपंच शरणजीत सिंह के मन में इतनी खौल रही थी कि एक साबका सैनिक को इज्जत व सम्मान देने की बजाय आए दिन अटकलों का दौर शुरू कर दिया, मसलन रंजिश बढ़ती ही गई और 4 फरवरी को दिन दिहाड़े उक्त साबका सरपंच शरणजीत सिंह ने अपने साथियों सहत मौजूदा सरपंच साबका सैनिक गुरमेज सिंह पर तेज़ धारदार हथियारों से जानलेवा हमला बोल दिया। जिसकी मौके पर ही मौत हो गई। उसकी दो बेटियां और पत्नि सदमे में हैं। मामला तो 302 तहत दर्ज कर लिया गया है।
पर सवाल यह है कि क्या देश के लोगों का एक सैनिक के प्रति यही प्यार और सत्कार है? क्या उसे कोई सिविल अधिकार नहीं है? क्या एक फौजी की जिंदगी इतनी सस्ती है? क्या प्रशासन को एक साबका सैनिक की बाकी जिंदगी को खुशहाल करने के लिए काम नहीं करना चाहिए। यदि सेवा निवृति से आते ही हर साबका सैनिक को जिला प्रशासन की तरफ से मान सम्मान की व्यवस्था की जाए तो ऐसी भयानक घटनाओं से एक फौजी को निश्चय ही सुरक्षित किया जा सकता है। वरना जोख़िम तो घर पर भी उतना ही है जितना फौज में होता है।
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