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वेदांत 2.0 — जीना ही आनंद है ✧ जो सुख किसी माध्यम से मिले — मंत्र, साधना, गुरु, धर्म, प्रवचन, ज्ञान, वस्तु, व्यक्ति — वह सब परिवर्तनशील है। क्योंकि म

वेदांत 2.0 — जीना ही आनंद है ✧

जो सुख किसी माध्यम से मिले —
मंत्र, साधना, गुरु, धर्म, प्रवचन, ज्ञान, वस्तु, व्यक्ति —
वह सब परिवर्तनशील है।
क्योंकि माध्यम जड़ है, और जड़ से आया आनंद भी क्षणिक है।
सुख आया — जाएगा।
प्रेम मिला — बदलेगा।
शांति मिली — टूटेगी।
जो आया है, वह जाएगा ही।
पेड़ फूल क्यों खिलाता है?
किसी साधना से नहीं।
किसी धर्म से नहीं।
किसी मंत्र से नहीं।
फूल खिलता है — क्योंकि उसका स्वभाव है।
मनुष्य भी भीतर ऐसा ही वृक्ष है।
उसके भीतर आनंद का फूल पहले से मौजूद है।
लेकिन मनुष्य माध्यम खोजता है —
और माध्यम बंधन बन जाते हैं।
धर्म कहता है — साधना करो।
गुरु कहता है — मार्ग पकड़ो।
ज्ञान कहता है — समझो।
ईश्वर कहता है — मुझे खोजो।
और जीवन चुपचाप कहता है —
बस जीओ।
सहज जीना ही धर्म है।
गहनता से जीना ही साधना है।
श्वास का आना-जाना ही ध्यान है।
जब जीवन पूरा जिया जाता है —
तब आनंद प्रयास से नहीं,
स्वभाव से खिलता है।
सुख और दुःख दोनों गतिशील हैं —
दिन और रात की तरह।
लेकिन सहज आनंद —
वह भीतर का फूल है,
जो बिना कारण खिलता है।
वेदांत 2.0 कहता है:
न धर्म चाहिए।
न गुरु चाहिए।
न शास्त्र चाहिए।
न साधना चाहिए।
जीवन ही पर्याप्त है।
जो जी रहा है — वही आनंद है।
जो श्वास चल रही है — वही प्रेम है।
जो अभी है — वही शांति है।
बाकी सब खोज — मन की है।

No knowledge, no guru, no mask.
If even this name becomes identity — forget it.
Just live — that is Vedanta 2.0.

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