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चमकते आंकड़ों के पीछे सिसकता मध्यप्रदेश: क्या हम 'कर्ज' की बुनियाद पर 'जश्न' की इमारत खड़ी कर रहे हैं?

✍️ डॉ. महेश प्रसाद मिश्रा / भोपाल

विशेष संपादकीय: जब तिजोरी खाली हो और घोषणाओं की बरसात हो, तो समझ लीजिए कि जनता की अगली पीढ़ी को गिरवी रखने की तैयारी है।
भोपाल: राजनीति में आंकड़ों का मायाजाल बड़ा अद्भुत होता है। यह उस चश्मे की तरह है जिसे पहनकर आपको गड्ढे भी 'विकास की लकीरें' दिखने लगते हैं। मध्यप्रदेश के संदर्भ में हाल ही में आई आर्थिक और सामाजिक रिपोर्टें इसी मायाजाल की गवाही दे रही हैं। एक तरफ हम 13% की विकास दर का ढोल पीट रहे हैं, तो दूसरी तरफ कर्ज का पहाड़ इतना ऊंचा हो गया है कि अब उसे छुपाना नामुमकिन है।
1. कर्ज की मदिरा और विकास का नशा
राज्य का कर्ज-जीएसडीपी अनुपात 33.7% तक पहुंचना कोई सामान्य बात नहीं है। यह खतरे की वह घंटी है जिसे सत्ता के शोर में अनसुना किया जा रहा है। सरल शब्दों में कहें तो, आज मध्यप्रदेश का हर बच्चा पैदा होते ही हजारों के कर्ज के साथ जन्म ले रहा है। हम पूंजीगत व्यय के नाम पर ₹82,513 करोड़ खर्च तो कर रहे हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह पैसा वाकई बुनियादी ढांचे पर लग रहा है या केवल चुनावी इवेंट्स और 'स्व-अभिनंदन' कार्यक्रमों की भेंट चढ़ रहा है?
2. कम बेरोजगारी का 'झूठ' और उपेक्षित स्वास्थ्य
सरकारी आंकड़ों में बेरोजगारी दर 1.6% दिखाई गई है। यह आंकड़ा जमीन पर संघर्ष कर रहे उन लाखों युवाओं के गाल पर तमाचा है जो पटवारी से लेकर पीएससी (PSC) तक की परीक्षाओं के लिए वर्षों से सड़कों पर धूल फांक रहे हैं। अगर बेरोजगारी इतनी कम है, तो हर सरकारी भर्ती पर लाखों की भीड़ क्यों टूट पड़ती है?
सबसे शर्मनाक आंकड़ा स्वास्थ्य का है। शिशु मृत्यु दर (IMR) का 43 होना (जो राष्ट्रीय औसत 28 से कहीं अधिक है) यह बताता है कि हमारे 'अजब-गजब' मध्यप्रदेश में ऊंची-ऊंची इमारतों और एक्सप्रेस-वे के नीचे मासूमों की सांसें दम तोड़ रही हैं। क्या यही वह 'स्वर्ण युग' है जिसका दावा किया जाता है?
3. जातिगत ध्रुवीकरण: विकास की विफलता का कवच
जब सरकारें आर्थिक मोर्चे पर नाकाम होती हैं, तो वे 'जाति' का ब्रह्मास्त्र निकालती हैं। मध्यप्रदेश में कभी मुस्लिम समाज की जातियों को OBC में शामिल करने का खेल, तो कभी आरक्षण की फाइलों को अदालतों में उलझाकर रखना—यह सब जनता का ध्यान असली मुद्दों से भटकाने की सुनियोजित साजिश है।
• सवाल यह है: क्या जाति का ठप्पा लग जाने से अस्पतालों में वेंटिलेटर मिल जाएंगे?
• सवाल यह है: क्या आरक्षण की नई श्रेणियां बनाने से कर्ज का बोझ कम हो जाएगा?
4. जनता का मौन: विनाश का आमंत्रण
वर्तमान सरकार 'घोषणाओं की मास्टर' बन चुकी है। मुख्यमंत्री महोदय मंचों से खुद ही तालियां बजवाते हैं, लेकिन जनता यह भूल रही है कि जो 'मुफ्त' की रेवड़ियां आज उन्हें बांटी जा रही हैं, उनकी कीमत कल उनके बच्चों को 'महंगाई' और 'टैक्स' के रूप में चुकानी होगी।
अंतिम चेतावनी: आत्ममंथन का समय
मध्यप्रदेश आज एक चौराहे पर खड़ा है। एक रास्ता वह है जहाँ हम सत्ता के विज्ञापनों और झूठी प्रशंसा के पीछे चलते रहें, और दूसरा रास्ता वह है जहाँ हम इन आंकड़ों की सच्चाई को पहचानें।
"जागो मध्यप्रदेश! क्योंकि जब कर्ज की किश्तें भारी होंगी, तब न तो कोई जाति काम आएगी और न ही कोई चुनावी भाषण। तब केवल खाली जेबें और सिसकते अस्पताल ही हमारी नियति होंगे।"

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